बुधवार, 1 अक्तूबर 2008

खतडु़वा - कूमाऊं में खत्म होती परंपरा

"खतडु़वा" कुमाऊं का एक प्रमुख त्योहार रहा है जो आश्विन मास की प्रथम तिथि या १ गते को (१५ सितम्न्बर के आस पास) मनाया जाता है। खतडु़वा एक प्रकार से पहाड़ों में शीत ऋतु के आरम्भ की घोषणा करता है। इसके नाम के सम्बन्ध में जो भी विवाद हों, पर मुझे इस त्योहार के बारे में सबसे पहले बचपन में मेरी स्व० दादी ने जो बताया था, उसके अनुसार खतडु़वा के दिन तक सर्दी इतनी हो जाती है कि रजाई (कुमाऊंनी में खातड़) ओढ़ने की आवश्यकता पड़ जाती है। मेरे विचार से वर्षा ऋतु की समाप्ति तथा शीत के आगमन के रूप में इसको मनाया जाना ही एक मात्र कारण है। ज्योतिष/खगोल शास्त्र के अनुसार सूर्य इस दिन से वृश राशि में प्रवेश कर जाता है तथा इस समय बारिश का प्रकोप समाप्त होकर सरदी दस्तक देने लगती है।
इसको जिस प्रकार आग जलाकर मनाया जाता है वह बोनफ़ायर या पंजाब में मनायी जाने वाली लोहड़ी का आभास कराता है। अंतर बस इतना है कि लोहड़ी का त्योहार शीत ऋतु की समाप्ति पर मनाया जाता है जबकि इसे शीत ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है। पर दोनों में ही सर्दी को दूर करने के लिए शाम को खुले में आग जलाकर एक सामूहिक आयोजन किया जान शामिल है। इस त्योहार का कोई विशेष विधि विधान भी नही है तथा यह छोटे मुख्यतया गांव/मुहल्ले के बच्चों/किशोरों द्वारा बड़े उत्साह से मनाया जाता है। बच्चे सूखी लकड़ियों तथा सूखी घास को एकत्र करते हैं जिससे फ़िर वह खतडु़वा का पुतला बनाते हैं। पुत्तले को बनाने में घर में पड़े जलाऊ कुड़े जैसे टुटे फ़र्नीचर, लकड़ी का बेकार सामान और पुराने कागज आदि को भी ले लिया जाता है। शाम को सुर्यास्त के बाद घर के सभी लोग एक मशाल बनाते है जिसे घर तथा गौशाला(गोठ) के कोने कोने त्तथा पशुओं व छोटे बच्चों के उपर से घुमाकर पुतले के पास लाकर उससे पुतले में आग लगा दी जाती है।
खतड़ुवा के पुतले में आग लगते ही बच्चों/किशोरों का उत्साह देखते ही बनता है और वह गाने लगते हैं "चल खतड़ुवा धारे-धार, गै की जीत खतड़ुवे की हार"। सभी मस्त होकर आग के चारों ओर गाते और नाचते हुये चक्कर लगाने लगते हैं। इस समय बच्चों का उत्साह देखने लायक होता है, शाम कि हल्की सर्दी के समय आग के चारों ओर नाचते गाते बच्चों/किशोरों का समूह तब तक सक्रिय रहता है जब तक कि आग शान्त नही हो जाती है। जैसे ही लौ शान्त होती है, आग को हरी लकड़ी की डालियों से पीटा जाता है। उसके बाद ककड़ी को गाय के खूंटे पर पटक कर नारियल की तरह तोड़ा जाता है जिसका कुछ भाग आग में डालकर बाकि सभी को बांट दिया जाता है। सभी आग के कोयलों के उपर से कुद्कर आग को लांघते हैं, बच्चों को तो इसमें बड़ा आनन्द आ रहा होता है। बड़े भी रस्म अदायगी के लिए ही सही पर एक बार आग को जरुर लांघते हैं।
जब कोयले भी बुझने लगते हैं तो अधजली लकड़ी के टुकड़ों को लोग अपने घरों को ले जाते हैं जिन्हें वे अपने गोठों (गौशाला) में रखते हैं। ऎसा माना जाता है कि इससे पशुओं की बुरी आत्माओं, बिमारी और अन्य बाधाओं से मुक्ति होती है, वे अधिक स्वस्थ होते है और अधिक दूद्ध देते हैं। इस दिन पशुओं का विशेष ध्यान रखा जाता है और उनको अधिक से अधिक हरा चारा दिया जाता है, बुजुर्गों का कहना है कि गाय के आगे घास का ढेर उसकी ऊंचाई से कम नही होना चाहिये। यह त्योहार पहाड़ के लोगों को आने वाली शीत ऋतु के लिए ईंधन, चारा तथा खाद्य पदार्थ संचित करने का भी संकेत करता है। खतड़ुवा की राख को सभी बुराईयों, बुरी आत्माओं तथा विध्न-बाधाओं के अंत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। खतड़ुवा के पुतले को जिस प्रकार पहले गौशाला आदि स्थानों से घुमाया जाता है वह उस स्थान से सभी बुरे विचारों, आत्माओं तथा जीवाणु/किटाणु को लौ में समाहित कर खतड़ुवे की अग्नि के हवाले कर समाप्त किये जाने को प्रदर्शित करता है।
खतड़ुवा मनाये जाने के सम्बन्ध में एक अन्य मान्यता भी चली आ रही है जिसके कारण इस त्यौहार के सम्बन्ध में कूमाऊं व गढ़वाल अंचल के लोगों के बीच में कई भ्रान्तियां पैदा कर दी गयी हैं। इसके अनुसार कूमाऊं के राजा रुद्रचन्द (जिनके नाम से ही तराई का रुद्रपुर नगर आबाद है), की मृत्यु के पश्चात सत्ता के लिए दावेदारों में करीब २ वर्ष तक संघर्ष चलता रहा। पर अंत में सभी को परास्त कर बाज बहादुर चन्द ने राज्य की बागडोर अपने हाथ में ले ली और अल्मोड़ा को अपनी राजधानी घोषित किया। उन्ही दिनो गढ़्वाल के राजा ने इस अस्थिरता का लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से कूमाऊं के सीमावर्ती क्षेत्रों में आक्रमण कर दिया। गढ़वाल की सेना ग्वाल्दम व चौखुटिया से होते हुये के कूमाऊ के गरूड़ और द्वारहाट तक पहुंच गयी तथा इसका नेतृत्व उनका सेनापति खतड़सिंह कर रहा था। बताते हैं कि उस समय खतड़सिंह क्षेत्र के लोगों के लिए मौत का पैगाम बन गया था।
गढ़्वाल की सेना के इस आक्रमण से त्रस्त होकर चौखुटिया, गरूड़ और द्वारहाट के लोग अल्मोड़ा दरबार में पहुंचे और राजा से रक्षा की गुहार की। राजा बाज बहादुर ने एक सेना गढ़्वाल पर आक्रमण हेतु तैयार कर दी। बरसात में जैसे ही गढ़वाल की सेना वापस लौटी, इस सेना ने गढ़्वाल के आदि बद्री के पास स्थित चांद्पुर गढ़ी पर आक्रमण कर दिया। लेकिन ऊंचाई पर स्थित चांद्पुर गढ़ी से गढ़्वाल की सेना के लाभ की स्थिति में होने के कारण कूमाऊं की सेना को सफ़लता नही मिली। ऎसी स्थिति में राजा बाज बहादुर चन्द को एक युक्ति सुझी। राजा बाज़ बहादुर चन्द ने गढ़्वाल पर आक्रमण के लिए एक विशाल सेना तैयार की।
जैसे ही बरसात का मौसम समाप्ति के ओर आया उन्होने सेना को गायों के झुण्ड के साथ चांद्पुर गढ़ी पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। जिसे पहले तो गढ़्वाल की सेना समझ नही पायी कि सेना उनकी तरफ़ बढ़ रही है। जब तक वह यह समझ पाते तो उनके लिए यह समस्या पैदा हो गयी कि गायों के बीच आ रहे कूमाऊं के सैनिकों को वह उपर आने से रोक नही पाये। क्योंकि अगर वह कूमाऊं के सैनिकों पर उपर से हमला करते तो सैनिकों के साथ ही गौहत्या की पाप के भी भागी बनते। इस असमंजस का लाभ उठाकर कुमाऊं की सेना चांद्पुर गढ़ी तक पहुंच गयी और गढ़वाल की सेना को घेर लिया।
इस प्रकार गायों की आड़ में कूमाऊं की सेना ने चांद्पुर गढ़ी पर आक्रमण कर कब्जा कर लिया और गढ़्वाल का सेनापति खतड़सिंह मारा गया। क्योंकि गायों की सहायता से कूमाऊं की सेना ने खतड़सिंह को मारकर गढ़्वाल की सेना को पराजित किया, कहा जाता है इसीलिए खतड़ुवा जलाते हुये "गै की जीत खतड़ुवे की हार" का घोष किया जाता है। पर इन सब बातों का कूमाऊं या गढ़्वाल के इतिहास में विस्तृत वर्णन नही मिलता है। शायद यह सब आंशिक रूप से सत्य रहा हो और लोगों ने इसे अपने अपने तरीके से प्रचारित कर दिया होगा। जैसा कि प्रथ्वीराज चौहान के बारे में "पृथ्वीराज रासो" में अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन मिलता है जिसका इतिहास से कोई लेना देना नही है।
मेरा व्यक्तिगत विचार है कि यह घट्ना हुयी होगी पर जैसे सेनापति का नाम खतड़सिंह होना साबित नही होता है। शायद क्षेत्र के लोगों में उससे खतरे के खौफ़ की वजह से उसे स्थानीय लोगों द्वारा खतड़सिंह उपनाम दे दिया गया होगा। इस प्रकार गै की जीत और खतड़ुवे की हार के नारे को नया रूप प्रदान कर दिया गया होगा। उपरोक्त घटना खतड़ुवा को प्रचारित करने में सहायक रही हो सकती है, क्योंकि समय काल मेल खाते हैं, पर खतड़ुवा का मनाया जाना इससे पुरानी परंपरा रही होगी। वैसे भी हमारे कूमाऊं में हर माह की शुरुवात किसी न किसी पर्व/त्यौहार से होती है। जहां तक खतड़ुवा का सम्बन्ध है, यह आश्विन माह के आरम्भ के साथ ही शीत ऋतु के आगमन की सूचना भी देता है।जिस प्रकार से इसे मनाया जाता है, उससे तो निश्चित ही इसका सम्बन्ध किसी ऎतिहासिक घटना से न होकर शीत ऋतु के आगमन से ही प्रतीत होता है।
वर्षा ऋतु के समाप्त होने तथा शीत ऋतु के शुरु होने पर लोगों को अपने पशुओं के लिए विशेष व्यवस्था करनी होती है, इस कारण इस दिन पर पशुऒं का विशेष ध्यान दिया जाता है। हमारे देश में घरेलू पशुओं में गाय को पहले से ही विशेष स्थान प्राप्त है इसलीए ही गौशालों की सफ़ाई आदि और पशुओं को सर्दी में ठण्ड से बचाने के लिए इसे एक प्रतीक के रूप मनाना प्रारम्भ हुआ होगा। मुझे तो खतड़ुवा सर्दी के प्रतीक के रूप में ही लगता है तथा जिसे जलाकर यह जताने की कोशिश की जाती है कि सर्दियों में भी हमारे पशु और लोग सुरक्षित रहेंगे। खतड़ुवा विशेष रूप से बच्चों तथा किशोरों द्वारा उत्साह के साथ मनाया जाता है। इससे तो यही लगता है कि यह उनको आने वाली शीत ऋतु में ठण्ड से बचने के लिए तैयार करता है। क्योंकि हमारे पहाड़ों में जब पुराने समय से रामलीला/दशहरे पर तक रावण का पुतला जलाने की परंपरा नही रही है, तो खतड़ुवा पर किसी गढ़वाल की सेना के सेनापति का पुतला जलाये जाने की बात गले नही उतरती है।
ऊत्तराखण्ड राज्य की स्थापना के बाद राज्य के कुमाऊं अंचल में खतडु़वा मनाना या तो पूरी तरह बंद हो गया है या मनाने के उत्साह में कमी आयी है। सितम्बर २००१ में जब मैं इसी समय दिल्ली से अपने घर गया तो मुझे पता चला कि अब खतड़ुवा नही जलाया जायेगा तो मुझे सचमुच बड़ा आश्चर्य हुआ। इसका मुख्य कारण है कि कुमाऊं के लोग अपने राज्य के दूसरे अंचल के साथियों की भावनाओं का सम्मान करते हुये किसी विवाद से बचना चाहते हैं। लेकिन कुमाऊं के ग्रामीण क्षेत्रों में नाम मात्र को ही सही पर इस त्योहार का अस्तित्व अभी बरकरार है। चाहे इसके पीछे उनका यह डर ही रहा हो कि अगर वह खतड़ुवा नही मनायेंगे तो उनके पशु दूध देना बंद कर देंगे।
किसी भी त्यौहार/पर्व को मनाना इस आधार पर बंद कर देना कि दूसरे की भावनाओं का सम्मान हो अच्छी बात है पर वर्षों से चली आ रही एक परंपरा को बंद कर देना भी कोई बुद्धिमानी नही है। नये राज्य के उदय के साथ कुछ नया आरंभ करने की बजाय हमने वर्षों से चली आ रही एक परंपरा की बलि दे दी। इस बारे में हमारे समाज के बुद्धिजीवी वर्ग की जो भी सोच रही हो, पर मुझे तो यह समाज के निर्णय की बजाय एक राजनैतिक स्टंट मात्र ही लगता है। जैसे कि महात्मा गांधी ने भी कहा है कि "पाप से घृणा करो पापी से नही" उसी प्रकार इस त्यौहार को मनाया जाना बंद करने की बजाय अगर इसके पीछे होने वाले क्षेत्रवाद के जहर को बंद करने की कोशिश होती तो बेहतर होता। कूमाऊं के शहरों में खतड़ुवा मनाना चाहे बंद कर दिया गया हो पर क्षेत्रवाद का जहर राजनीति में जारी है। कितना अच्छा होता कि इस दिन खतड़ुवा की आग में दोनों अन्चलों के लोग राजनैतिक स्वार्थों, क्षेत्रवाद और सम्प्रदायवाद को समाप्त करने का प्रण लेते।

सोमवार, 1 सितंबर 2008

देवीधुरा का बगवाल मेला



उत्तराखण्ड के कुमाऊं मण्डल के चम्पावत जनपद का देवीधुरा नामक स्थान वाराही देवी के प्राचीन मन्दिर के कारण दूर दूर तक जाना जाता है। इसी वाराही देवी मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष रक्षावन्धन के अवसर पर श्रावणी पूर्णिमा को "बगवाल" मेले का आयोजन किया जाता है। बगवाल मेले की विशेषता यह है की इसमें एक विशेष प्रकार की प्रतियोगिता आयोजित होती जिसमें दो दल एक दूसरे पर पत्थरों की वर्षा करते हैं। अपने आप में एक अनोखी एवं विशिष्ट इस प्रतियोगिता के कारण बगवाल मेला उत्तराखण्ड के मेलों में अपनी अलग पहचान रखता है। पिछ्ले कुछ वर्षों में टी.वी. मिडिया के प्रसार के कारण तो अब यह मेला राष्ट्रीय पहचान बनाने लगा है।
यह ऎतिहासिक मेला कितना प्राचीन है, इस विषय में विभिन्न मत-मतान्तर हैं। लेकिन इस बात पर आम सहमति है कि यहां पर पूर्व में प्रचलित नरबलि की परम्परा के अवशेष के रुप में ही बगवाल मेले का आयोजन होता है। प्राचीन लोक मान्यता है कि वाराही देवी ने, देवीधुरा के सघन वन में बावन हजार वीर और चौंसठ योगनियों के आतंक से मुक्ति देने के प्रतिफल के रुप में स्थानीय जनों से नरबलि की मांग की। जिसके कारण चंद शासनकाल तक महर और फर्त्याल जातियों द्वारा क्रम से यहाँ श्रावणी पूर्णिमा को प्रतिवर्ष नर बलि दी जाती थी। पर बाद में स्थानीय लोगों द्वारा निश्चित किया गया कि पत्थरों की मार से घायल व्यक्तियो के, एक व्यक्ति के खून के बराबर निकले रक्त से देवी को तृप्त किया जाये। यह भी निश्चित किया गया कि पत्थरों की मार प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को आयोजित की जाएगी। इस प्रकार उसी प्रथा को तब से आज तक भी निभाया जा रहा है।
बगवाल परंपरा की शुरूवात कब हुयी इस बारे में अभी तक कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है। ज्यादातर इतिहासकारों के अनुसार महाभारत में पर्वतीय क्षेत्रों में निवास कर रही एक ऐसी जाति का उल्लेख है। जो इस युद्ध में प्रवीण थी तथा जिसने पाण्डवों की ओर से महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। अगर इस पर विश्वास किया जाये तो पत्थरों के युद्ध की परम्परा का समय काफी प्राचीन ठहरता है। वाराही देवी मन्दिर के आस-पास काफ़ी बडे़ कई पत्त्थर देखे जा सकते हैं। इन पत्थरों के बारे में कहा जाता है कि इन्हें पांडव अपने खेल के लिए गेंद के रूप में प्रयोग करते थे। कुछ इतिहासकार इसे आठवीं-नवीं शती ई. से प्रारम्भ मानते हैं, तो कुछ इस परंपरा क खास जाति से भी सम्बन्धित करते हैं।
बगवाल को इस परम्परा को वर्तमान में महर और फ़र्त्याल जाति के लोग मुख्य रूप से सजीव करते हैं। इनकी टोलियाँ ढोल, नगाड़ो के साथ किंरगाल (रिन्गाल या निंगाल जो बांस के ही एक किस्म है) की बनी हुई छतरी जिसे छन्तोली कहते हैं, सहित अपने-अपने गाँवों से भारी उल्लास के साथ देवी मंदिर के प्रांगण में पहुँचती हैं। सिर पर कपड़ा बाँध हाथों में दण्ड तथा फूलों से सजा फर्रा-छन्तोली लेकर मंदिर के सामने परिक्रमा करते हैं। बगवाल प्रतियोगिता में क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या जवान, सभी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। बगवाल खेलने वाले द्यौके कहे जाते हैं तथा। वे पहले दिन से सात्विक आचार व्यवहार रखते हैं। देवी की पूजा के विभिन्न क्रिया कलापों का दायित्व विभिन्न जातियों का है। फुलारा कोट के फुलारा मंदिर में पुष्पों की व्यवस्था करते हैं। मनटांडे और ढ़ोलीगाँव के ब्राह्मण श्रावण की एकादशी के अतिरिक्त सभी पर्वों पर पूजन करवा सकते हैं। भैंसिरगाँव के गहढ़वाल राजपूत बलि के भैंसे पर पहला प्रहार करते हैं।
बगवाल का एक निश्चित विधान है, मेले के पूजन अर्चन के कार्यक्रम यद्यपि आषाढि कौतिक के रुप में एक माह के लगभग चलते हैं। लेकिन विशेष रुप से श्रावण माह की शुक्लपक्ष की एकादशी से प्रारम्भ होकर भाद्रपद कष्णपक्ष की द्वितीया तिथि तक परम्परागत पूजन होता है। बगवाल के लिए सांगी पूजन एक विशिष्ट प्रक्रिया के साथ सम्पन्न किया जाता है। जिसे परम्परागत रुप से पूर्व से ही, सम्बन्धित चार खामों (ग्रामवासियों का समूह) गहढ़वाल, चम्याल, वालिक तथा लमगडि़या के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। मंदिर में रखा देवी विग्रह एक सन्दूक में बन्द रहता है जिसके समक्ष पूजन सम्पन्न होता है। यही का भार लमगड़िया खाम के प्रमुख को सौंपा जाता है। जिनके पूर्वजों ने पूर्व में रोहिलों के हाथों से देवी-विग्रह को बचाने में अपूर्व वीरता दिखाई थी। इस बीच अठ्वार का पूजन होता है, जिसमें सात बकरे और एक भैंसे का बलिदान दिया जाता है।
पूर्णिमा को भक्तजनों की जयजयकार के बीच डोला देवी मंदिर के प्रांगण में रखा जाता है। चारों खाम के मुखिया पूजन सम्पन्न करवाते है। गहढ़वाल प्रमुख श्री गुरु पद से पूजन प्रारम्भ करते है। चारों खामों के प्रधान आत्मीयता, प्रतिद्वेंदिता, शौर्य के साथ बगवाल के लिए तैयार होते हैं। द्यौकों के अपने-अपने घरों से महिलाये आरती उतार, आशीर्वचन और तिलक चंदन लगाकर हाथ में पत्थर देकर ढोल-नगाड़ों के साथ बगवाल के लिए भेजती हैं। इन सबका मार्ग पूर्व में ही निर्धारित होता है। मैदान में पहँचने का स्थान व दिशा हर खाम के लिए अलग-अलग होती है। उत्तर की ओर से लमगड़ीया, दक्षिण की ओर से चम्याल, पश्चिम की ओर से वालिक और पूर्व की ओर से गहड़वाल मैदान में आते हैं। दोपहर तक चारों खाम देवी के मंदिर के उत्तरी द्वार से प्रवेश करती हुई परिक्रमा करके मंदिर के दक्षिण-पश्चिम द्वार से बाहर निकलती है। फिर वे देवी के मंदिर और बाजार के बीच के खुले मैदान में दो दलों में विभक्त होकर अपना स्थान घेरने लगते हैं।
दोपहर में जब मैदान के चारों ओर भीड़ का समुद्र उमड़ पड़ता है तब मंदिर का पुजारी बगवाल प्रारम्भ होने की घोषणा शुरु करता है। इसके साथ ही खामों के प्रमुख की अगुवाई में पत्थरों की वर्षा दोनों ओर से प्रारम्भ होती है। ढ़ोल का स्वर ऊँचा होता जाता है, छन्तोली से रक्षा करते हुए दूसरे दल पर पत्थर फेंके जाते हैं। धीरे-धीरे बगवाली एक दूसरे पर प्रहार करते मैदान के बीचों बीच बने ओड़ (सीमा रेखा) तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। फर्रों से मजबूत रक्षा दीवार बनायी जाती है। जिसकी आड़ से वे प्रतिद्वन्दी दल पर पत्थरों की वर्षा करते हैं। पुजारी को जब अंत:करण से विश्वास हो जाता है कि एक मानव के रक्त के बराबर खून बह गया होगा तब वह ताँबें के छत्र और चँबर के साथ मैदान में आकर बगवाल सम्पन्न होने की घोषणा करता है।
बगवाल के निर्णायक(पुजारी) द्वारा प्रतियोगिता का समापन शंखनाद किये जाने से होता है। समापन के साथ ही एक दूसरे के प्रति आत्मीयता दर्शित कर द्यौके धीरे-धीरे खोलीखाण दूबाचौड़ मैदान से बिदा होते हैं। जिसके बाद मंदिर में पूजा अर्चन का कार्यक्रम चलता है। कहा जाता है कि पहले जो बगवाल आयोजित होती थी उसमें फर का प्रयोग नहीं किया जाता था, परन्तु सन् १९४५ के बाद फर का प्रयोग सुरक्षा हेतु किया जाने लगा। बगवाल प्रतियोगिता के नियमों के अनुसार आज भी किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाकर पत्थर मारना निषिद्ध है।
बगवाल के बाद रात्रि को मंदिर में देवी जागरण का आयोजन होता है। श्रावणी पूर्णिमा के दूसरे दिन बक्से में रखे देवी विग्रह की डोले के रुप में शोभा यात्रा भी निकाली जाती है। यहां पर देवी को पशुबलि दिये जाने की परंपरा भी है, जिसमें कई भक्त देवी को बकरे का बलिदान देते हैं। कुछ भक्तगण देवी को बकरे के अतिरिक्त अठ्वार अर्थात सात बकरे तथा एक भैंसे की बलि भी अर्पित करते हैं। यहां पर दो बड़े पत्थरों की आकृति इस प्रकार से है कि उनके बीच के संकरे अंतराल से साधारण व्यक्ति भी सीधे नही निकल पाता। जबकि एक मनुस्य से आकार में कई गुना बड़ा भैंसा आराम से इन दो पत्थरों के बीच से बिना किसी परेशानी के सीधा निकल जाता है।
बगवाल मेले की अनोखी व प्राचीन परंपराओं के कारण दूर दूर से लोग इस आयोजन को देखने आते हैं। दृश्य संचार-साधनों के प्रसार के बाद तो अब यह मेला राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो चुका है। बगवाल के दिन देश के लगभग सभी न्यूज चैनल्स पर बगवाल प्रतियोगिता का लाईव टेलीकास्ट देखा जा सकता है। जो अपने आप में इस मेले की लोकप्रियता को प्रकट करता है। अब तो बगवाल देखने के लिए देवीधुरा आने वाले दर्शकों की गिनती लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। लेकिन इसकी लोकप्रियता बढ़ने के साथ साथ यहां पर सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है, क्योंकि इस प्रतियोगिता में दर्शक भी पत्थरों की मार से घायल होते हैं। एक छोटे से स्थान पर लाख लोगों के एकत्र होने से भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न ना हो इसका विशेष प्रबन्ध भी भविष्य में किया जाना आवश्यक है।

गुरुवार, 17 जुलाई 2008

"भिटौली": ऊत्तराखण्ड की एक महत्वपूर्ण सामाजिक परम्परा

"भिटौली" शब्द भेंट से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ स्थानीय भाषा में मिलने से होता है, जहां तक इस त्योहार का समबन्ध है तो इसमें शादीशुदा लड़्की के मायके वाले अपनी बहन/बेटी को उसके ससुराल में जाकर भेंट (यहां पर यह स्थानीय भाषा के अनुसार मिलने और उपहार देने दोनो अर्थों में है) या "भिटौली" देते हैं। इस भेंट में मायके वालों की तरफ़ से पहले पिता (अगर जीवित हैं तो) इसे लेकर लड़की के घर जाते हैं तथा पिता की मृत्यु के बाद भाई इस कार्य को निभाते हैं। यह प्रथा इसलिये भी शुरु हुई होगी कि पहले आवागमन के सुगम साधन उपलब्ध नहीं थे और ना ही लड़की को मायके जाने की छूट। लड़की किसी निकट समबन्धी के शादी ब्याह या दु:ख बिमारी में ही अपने ससुराल से मायके जा पाती थी। इस प्रकार अपनी शादीशुदा लड़की से कम से कम साल में एक बार मिलने और उसको भेंट देने के प्रयोजन से ही यह त्यौहार बनाया गया होगा। भाई-बहन के प्यार को समर्पित यह त्यौहार (रिवाज) सिर्फ उत्तराखण्ड के लोगों के द्वारा मनाया जाता है। विवाहित बहनों को चैत का महिना आते ही अपने मायके से आने वाली 'भिटौली' की सौगात का इंतजार रहने लगता है।

शादी के बाद की पहली भिटौली लड़की को उसकी डोली (विदाई) के समय समय ही दी जाती है, और उसके बाद जो पहला चैत का महीना होता है (लड़की की शादी के वर्ष) उसे काला महीना कहा जाता है, लड़की उस महीने (शादी के एक साल के अंदर पढ़ने वाले चैत के महीने में) अपने मायके में ही रहती है। जिस कारण शादी के पहले वर्ष की भिटौली वैशाख में लड़की को ससुराल में विदा करते समय दी जाती है (क्योंकि विवाह के पहले वर्ष के चैत्र को काला महीना माना जाता है), फिर अगले वर्ष से जन्म पर्यंत भाई अपनी बहिन को हर वर्ष चैत्र के महीने में भिटौली देता है। चैत्र महीने की ५ गते तक विवाहित महिला को स्वयं तथा किसी और के द्वारा उसके सामने महीने का नाम लेना भी वर्जित होता है।

उत्तराखण्ड की हर विवाहित महिला चैत माह में अपने मायके वालों से भिटौली का इंतजार करती है, जिसे पूरे गांव में बांटा जाता है। यह त्यौहार हमारे सामाजिक सदभाव का भी प्रतीक है। इस माह का महिलाओं के लिये कितना महत्व है, हमारे लोकगीतों के माध्यम से सहज ही जाना जा सकता है। स्व० गोपाल बाबू गोस्वामी जी का यह गीत इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता है:
"ना बासा घुघुती चैत की, याद आ जैछे मैके मैत की...................."

भिटौली से संबंधित कई कहानियां प्रचलित है, जिसमें से एक प्रकार है कि:
बहुत समय पहले किसी गांव में सचदेव नाम का लड़का रह्ता था, उसकी बहिन का विवाह पाताल लोक में किसी नाग के साथ हुआ था। जब उसकी बहन का विवाह हुआ तब सचदेव बहुत छोटा था। जैसे जैसे सहदेव बड़ा हुआ और जब शादी के कई साल बीतने पर भी उसकी बहिन मायके नही आ पायी तो सचदेव को अपनी बहन की याद सताने लगी। और एक दिन वह उससे मिलने पाताल लोक चला गया, लेकिन नाग ने सहदेव को पहले कभी देखा नही था। उन दोनों भाई बहनों को साथ देखकर वह उन दोनो के रिश्ते को शक की निगाह से देखने लगा। क्योंकि नाग सचदेव से कभी मिला नही था, इसलिये उसने उन भाई बहनो के बारे में कुछ अपमानजनक बातें कही। ऐसी लज्जाजनक बातें सुन कर सचदेव को बड़ ग्लानि हुयी और उसने आत्महत्या कर ली। नाग को जब असलियत का पता चला तो उसने भी आत्महत्या कर ली। अपने भाई व पति के देहान्त के उप्रान्त सचदेव की बहिन ने सोचा कि अब उसकी भी जिंदगी व्यर्थ है और उसने भी अपनी इहलीला समाप्त कर दी। इन दोनों भाई-बहनो के त्याग और बलिदान को याद करते हुए त्यौहार आज भी प्रचलन में है.

भिटौली के सम्बन्ध में एक और दंत कथा (लोक कथा) इस प्रकार की भी प्रचलित है:
एक गाँव में नरिया और देबुली नाम के भाई - बहन रहते थे और दोनो भाई बहनों में बहुत प्यार था। जब देबुली १५ वर्ष की हुयी तो उसकी शादी हो गई (जो उस समय के अनुसार शादी के लिए बहुत ज्यादा उम्र थी)। देबुली की शादी के बाद भी दोनों भाई बहनों को ही एक दूसरे का विछोह सालता रहा। दोनों भाई बहन भिटौली के त्यार की प्रतीक्षा करने लगे। अंततः समय आने पर भिटौली के दिन नरिया भिटौली की टोकरी सर पर रख कर खुशी - खुशी बहन से मिलने चला। बहन देबुली बहुत दूर ब्याही गयी थी, पैदल चलते - चलते नरिया शुक्रवार की रात को दीदी के गाँव पहुँच पाया। जब नरिया अपनी बहन देबुली के घर पहुंचा तो देबुली तब गहरी नींद में सोई थी, थका हुआ नरिया भी देबुली के पैर के पास सो गया। सुबह होने के पहले ही नरिया की नींद टूट गयी, देबुली तब भी सोई थी और नींद में कोई सपना देख कर मुस्कुरा रही थी। अचानक नरिया को ध्यान आया कि सुबह शनिवार हो जायेगा और शनिवार को देबुली के घर ले कर आने के लिये उसकी ईजा ने मना कर रखा था। नरिया ने भिटौली की टोकरी दीदी के पैर के पास रख दी और उसे प्रणाम कर के वापस अपने गाँव चला गया। देबुली सपने में अपने भाई को भिटौली ले कर अपने घर आया हुआ देख रही थी, नींद खुलते ही पैर के पास भिटौली की टोकरी देख कर उसकी बांछें खिल गयीं। वह भाई से मिलने दौड़ती हुई बाहर गयी, लेकिन भाई नहीं मिला। वह पूरी बात समझ गयी, |भाई से न मिल पाने के हादसे ने उसके प्राण ले लिये। कहते हैं देबुली मर कर 'घुघुती' (उत्तराखण्ड में घुघुती चिड़िया को सभी जानते हैं) बन गयी और चैत के महीने में आज भी कुछ इस प्रकार गाती है:
भै भुखो मैं सिती, भै भुखो मैं सिती

भिटौली आने पर घर में त्यौहार का माहौल हो जाता है, क्योंकि हर घर में बहुऎं अपने मायके से आने वाली "भिटौली" का ईन्तजार करती हैं। घर में भिटौली के साथ आने वाले पकवानों को गांव-पडोस में बांटा जाता है और इस तरह यह त्यौहार सामाजिक सदभाव को भी बढ़ावा देता है। चैत्र मास के दौरान पहाडो में सामान्यतः खेतीबारी के कामों से भी लोगों को फुरसत रहती है। जिस कारण यह रिवाज अपने नाते-रिश्तेदारो से मिलने जुलने का और उनके हाल-चाल जानने का एक माध्यम बन जाता है।

आज से कुछ दशक पहले जब यातायात व संचार के माध्यम इतने नहीं थे उस समय की महिलाओं के लिये यह परंपरा बहुत महत्वपूर्ण थी। जब साल में एक बार मायके से उनके लिये पारंपरिक पकवानों की पोटली के साथ ही उपहार के तौर पर कपडे आदि आते थे। इसमें एक तथ्य और है कि जब तक किसी महिला को भिटौली नहीं मिलती तब तक उस महिला के सामने चैत महीने का नाम नहीं लिया जाता है तथा इसे अपशगुन माना जाता है। ऎसा होने पर वह महिला अपने पहने कपड़े फाड़ देती है, ताकि उसका भाई जीवित रहे। पर यह सब परम्पराऎं अब केवल प्रतीकात्मक रूप में ही मौजूद रह गयी हैं।

समय बीतने के साथ-साथ इस परंपरा में कुछ बदलाव आ चुका है। इस रिवाज पर भी औपचारिकता और शहरीकरण ने गहरा प्रभाव छोडा है, वर्तमान समय में अधिकतर लोग फ़ोन पर बात करके कोरियर से गिफ़्ट या मनीआर्डर/ड्राफ़्ट से अपनी बहनों को रुपये भेज कर औपचारिकता पूरी कर देते हैं। आज यह त्योहार भाई बहन के प्रेमभाव की बजाय आर्थिक हित साधने का तथा स्टेटस सिमबल ज्यादा बनता जा रहा है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी प्रेमभाव व पारिवारिक सौहार्द के साथ भिटौली का खास महत्व बना हुआ है।

मंगलवार, 15 जुलाई 2008

हरेला या हर्याव: उत्तराखंड का एक प्रमुख त्यौहार

हरेला या हर्याव

हरेला उत्तराखंड का एक प्रमुख त्यौहार होने के साथ साथ यहां की संस्कृति का एक अभिन्न अंग भी है। इस त्यौहार का सम्बन्ध सामाजिक सोहार्द के साथ साथ कृषि व मौसम से भी है। हरेला, हरियाली अथवा हरकाली हरियाला का समानार्थी है तथा इस पर्व को मुख्यतः कृषि और शिव विवाह से जोड़ा जाता है। देश धनधान्य से सम्पन्न हो, कृषि की पैदावार उत्तम हो, सर्वत्र सुख शान्ति की मनोकामना के साथ यह पर्व उत्सव के रुप में मानाया जाता है। कुछ विद्वान मानते हैं कि हरियाला शब्द कुमाऊँनी भाषा को मुँडरी भाषा की देन है।

समान्यतया हरेला साल में तीन बार मनाया जाता है।
१. चैत्र: चैत्र मास के प्रथम दिन बोया जाता है और नवमी को काटा जाता है।
२. श्रावण: आषाढ़ मास के २२वें दिन बोया जाता है और १० दिन बाद काटा जाता है।
३. आशिवन: आश्विन नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है।

चैत्र व आश्विन मास में बोया जाने वाला हरेला मौसम के बदलाव के सूचक है।
चैत्र मास में बोया/काटा जाने वाला हरेला गर्मी के आने की सूचना देता है,
तो आश्विन मास की नवरात्रि में बोया जाने वाला हरेला सर्दी के आने की सूचना देता है।

लेकिन श्रावण मास में मनाये जाने वाला हरेला सामाजिक रूप से अपना विशेष महत्व रखता तथा समूचे कुमाऊँ में अति महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक माना जाता है। जिस कारण इस अन्चल में यह त्यौहार अधिक धूमधाम के साथ मनाया जाता है। जैसाकि हम सभी को विदित है कि श्रावण मास भगवान भोलेशंकर का प्रिय मास है, इसलिए हरेले के इस पर्व को कही कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों में कथा है कि शिव की अर्धांगिनी सती ने अपने कृपण रुप से खिन्न होकर हरे अनाज वाले पौधों को अपना रुप देकर पुनः गौरा रुप में जन्म लिया। इस कारण ही सम्भवतः शिव विवाह के इस अवसर पर अन्न के हरे पौधों से शिव पार्वती का पूजन सम्पन्न किया जाता है।

श्रावण माह के प्रथम दिन, वर्षा ॠतु के आगमन पर हरेला काटकर यह त्यौहार मनाया जाता है जिसे दस दिन पहले बोया जाता है। हरेला बोने के लिए सबसे पहले उस पात्र का निर्माण किया जाता है जिसमें हरेला बोना होता है। इसके लिये निंगल(रिन्गाल) की टोकरी, किसी लकड़ी के करीब १ वर्गफ़ुट के छोटे से बक्से में या फ़िर पांच या सात दोनों में भी हरेला बोया जा सकता है। अगर बक्से या टोकरी में हरेला बोया जाता है तो पानी डालने की सुविधा के लिये उसमे लकड़ी फ़साकर ५ या ७ अलग-अलग चैम्बर से बना दिये जाते हैं।

पात्र के निर्माण के उपरान्त भिन्न प्रकार के खाद्यानों के बीजो को बोने के लिये अलग अलग रख लिया जाता है। बोये जाने वाले बीजों में मुख्यतः अनाज तथा दालें जैसे जैसे गेहूं, धान, जौ, मक्का, गहत(घौत या कुलथ), मास(उरद), सरसों, भट्ट(काली सोयाबीन) आदि शामिल होते हैं। जिस पात्र में हरेला बोना होता है उसमें मिट्टी के एक १.५ - २ इन्च मोटी परत बना दी जाती है। फ़िर घर का प्रत्येक सदस्य एक प्रकार का बीज लेकर थोड़ा-थोड़ा बीज पात्र में बोता है, इसके बाद मिट्टी एक हल्की परत इसके उपर बना दी जाती हैं। फ़िर यही प्रक्रिया प्रत्येक किस्म के बीज के साथ अपनायी जाती है तथा बीज और मिट्टी की ५ या ७ परतें बन जाती हैं।

हरेले के पात्र को अब घर के अन्दर पूजास्थल जिसे कूमाऊं में द्यापतक थान भी कहते हैं में पवित्रता के साथ रख दिया जाता है। घर का कोई व्यक्ति स्नानकर पवित्रता के साथ नियमित या आवश्यक्तानुसार थोड़ा थोड़ा पानी पात्र में छिड़कता रहता है। करीब ३-४ दिनों के बाद बीजो में से अंकुर निकल आते हैं और ९-१० दिनों में ये बढ़्कर ६-७ इंच के छोटे छोटे पौधे का रूप धारण कर लेते हैं। इन पौधों को सूर्य की रोशनी उपलब्ध ना होने के कारण इनका रंग पीला होता है, इन पीले-हरे पौधों को ही हरयाव(हरेला) कहा जाता है।

बोने के दिन से दसवे दिन हरेला (हर्याव) काटा जाता है तथा इसे सबसे पहले देवताओं को अक्षत, रोली(पिठियां या पिठाई), चन्दन आदि के साथ विधिपूर्वक चढ़ाया जाता है। इसके बाद घर का वरिष्ठतम सदस्य या फ़िर कुलपुरोहित घर के सभी सदस्यों के हरेला लगाता है, हरेला लगाने से तात्पर्य है कि उनके सर व कान पर हरेले के तिनके रखे जाते है। हरेला लगाने वाला हरेला लगाते समय स्थानीय भाषा में शुभकामनाऎं भी देता है, जिसका मन्त्रोच्चार के समान पाठ किया जाता है। इसमें उसके दीर्घायु होने, समृद्धि एवं सुख की कामना की जाती है। छोटे बच्चो को हरेला पैर से ले जाकर सर तक लगाया जाता है तथा इसके साथ ही शुभकामना गीत "जी रये-जाग रये" गाया जाता है।

लाग् हरेला, लाग् दसैं, लाग् बगवाल|
जी रये जागी रये, धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये|
सूर्ज जस तराण हो, स्यावे जसि बुद्धि हो|
दूब जस फलिये, सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये|

"हरेला, दशेरा, और बग्वाल तुझे मिले, जीते रहो, जागरूक रहो, पृथ्वी के समान धैर्यवान, आकाश के समान प्रशस्त (उदार) बनो, सूर्य के समान शक्तिमान (ओजमयी) बनो, सियार के समान बुद्धि हो, दूब के तृणों के समान फलीभूत हो जाओ|इतने दीर्घायु हो कि (दंतहीन) होने के कारण तुम्हें भात भी पीस कर खाना पड़े और शौच जाने के लिए भी लाठी का उपयोग करना पड़े|"

हरेला घर मे सुख, समृधि व शान्ति के लिए बोया व काटा जाता है तथा यह अच्छी कृषि का सूचक है। हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है की इस साल फसलो को नुक्सान ना हो। हरेला के साथ जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि जिसका हरेला जितना बडा होगा उसे कृषि मे उतना ही फायदा होगा। इस प्रकार हम कह सक्ते हैं कि हरेला उत्तराखण्ड की संस्कृति के खेती से लगाव को प्रदर्शित करने वाला त्यौहार है।

सोमवार, 30 जून 2008

जागर - उत्तराखंड में देवताओं के आह्वान का पवित्र अनुष्ठान

सभी जानते हैं कि उत्तराखंड प्रदेश को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है, ऐसा माना जाता है कि इस अंचल के कण-कण में देवी देवता निवास करते हैं। उत्तराखण्ड देवाधिदेव महादेव भगवान् शिव का घर (कैलाश पर्वत) भी है और ससुराल (कनखल, हरिद्वार) भी हमारे वेद-पुराणों में भी सभी देवी-देवताओं का निवास हिमालय के उत्तराखण्ड अंचल में ही माना गया है। उत्तराखण्ड में शिव मन्दिर प्रायः हर स्थान पर पाए जाते है इसीलिए यहाँ के बारे में कहा जाता है कि, "जितने कंकर, उतने शंकर"। सभी हिंदू देवी देवताओं की आराधना के साथ साथ यहाँ पर स्थानीय रूप से पूजे जाने वाले कई देवी-देवताओं का भी यहाँ की संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है
जागर शुद्ध संस्कृत शब्द है जो जाग के साथ घल् प्रत्यय लगाकर बना है उसका अर्थ है जागरण उत्तराखंडवासियों का ऐसा विश्वास है कि देवी-देवता अपने भक्तों का हर कष्ट का निवारण करने के लिये हमारे पास आते हैं देवताओं की की आत्मा के किसी पवित्र शरीर के माध्यम से कुछ समय के लिए अवतरित होने की इसी प्रक्रिया को कहा जाता है- "जागर"। जागर शायद जागरण का ही अपभ्रंश हो सकता है क्योंकि जागर का आयोजन सामान्यतया रात्रि में ही होता है। लेकिन जिस रूप में इसका आयोजन किया जाता है उसके अनुसार जागर से अभिप्राय एक ऎसे रात्रि जागरण या जगराते के आयोजन से है जहां एक अदृश्य आत्मा (देवी-देवताओं) को जागृत कर उसका आह्वान कर उसे किसी व्यक्ति के शरीर में अवतरित किया जाता है।
इस प्रकार गूढ़ अर्थ में जागरण से अभिप्राय केवल जागने से ना होकर देवता की आत्मा को जागृत करने तथा उसे किसी व्यक्ति में (जिसे डंगरिया कहते हैं) में अवतरित कराने से है। इस कार्य के लिये जागरिया जागर लगाता है तथा देवता के आह्ववान हेतु देवता की जीवनी और उसके द्वारा किये कार्यों का बखान अपने साथी गाजे बाजे वालों के साथ गाते हुये करता है। जगर में वाद्य यंत्रों के रूप में हमारे लोक वाद्य हुड़्का और कांसे की थाली का प्रमुख रुप से प्रयोग किया जाता है। इन गीतों को जागर कहने का तर्क यह है कि इनमें देवी शक्ति को जाग्रत करने का आह्वान होता है, इसलिये इनका प्रारंभ जागने-जगाने के उद्बोधन से होता है
अवधि के अनुसार जागर कई प्रकार की होती है:-
सामान्य जागर एक दिन (रात्रि में) की होती है
विशेष प्रयोजन हेतु चार दिन तक आयोजित की जाने वाली जागर के इस कार्यक्रम को चौरास कहते हैं। बैसी- बाईस दिन लगातार आयोजित की जागर के कार्यक्रम को बैसी कहते हैं। यह किसी बड़े परिवारसमूह के द्वारा सामूहिक रूप से आयोजित की जाती है

स्थान के अनुसार जागर घर के अंदर तथा घर के बाहर या मंदिरों में बने विशेष स्थल पर आयोजित की जाती है
आयोजित किए जाने उद्देश्य के अनुसार जागर दो प्रकार की होती है:
एक जागर जो जिसका आयोजन देवी देवताओ या अपने ईष्ट की आराधना के लिए होता है
दूसरी जागर किसी मृत आत्मा (जैसे के किसी पूर्वज जिसकी अकाल मृत्यु हुयी हो और अंतिम संस्कार विधिपुर्वक न हुआ हो) की शान्ति के लिए!
जागर के संचालन में मुख्य रुप से निम्न लोग शामिल होते है:-
१- जगरिया या धौंसिया
२- डंगरिया
३- स्योंकार-स्योंने या सोंकार
४- गाजेबाजे वाले - जो जगरिया के साथ गायन में तथा वाद्ययंत्रों के संगीत से सहयोग करते हैं।
इनके अतिरिक्त स्योंकार के घर के अन्य सदस्य, सम्बन्धी, मित्रगण व गांव पड़ोस के लोग भी जागर में दर्शक की तरह शामिल होते हैं तथा देवता से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
जगरिया या धौंसिया-
जगरिया या धौंसिया उस व्यक्ति को कहा जाता है जो अदृश्य आत्मा को जागृत करता है, इसका कार्य देवता की जीवनी, उसके जीवन की प्रमुख घटनायें व उसके प्रमुख मानवीय गुणों को लोक वाद्य के साथ एक विशेष शैली में गाकर देवता को जागृत कर उसका अवतरण डंगरिया से शरीर में कराना होता है।यह देवता (जोकि डंगरिया के शरीर में अवतरित होते हैं) को प्रज्जलित धूनी के चारों ओर चलाता है और उससे जागर लगवाने वाले की मनोकामना पूर्ण करने का अनुरोध करता है। यह कार्य मुख्यतः हरिजन लोग करते हैं और यह समाज का सम्मानीय व्यक्ति होता है, इसके लिये जागर लगवाने वाला व्यक्ति नये वस्त्र और सफेद साफा लेकर आता है और यह उन्हें पहन कर यह कार्य करता है। जगरिया को भी खान-पान और छूत आदि का भी ध्यान रखना होता है।
डंगरिया, पश्वा या धामी-
डंगरिया वह व्यक्ति होता है, जिसके शरीर में देवता का अवतरण होता है, इसे डगर (रास्ता) बताने वाला माना जाता है, इसलिये इसे डंगरिया कहा जाता है। जब डंगरिया के शरीर में देवता का अवतरण हो जाता है है तो उसका पूरा शरीर कांपता है और वह सभी दुःखी लोगों की समस्याओं के समाधान बताता है, उसे उस समय देवता की तरह ही शक्ति संपन्न और सर्वफलदायी माना जाता है।
डंगरिया को गढ़वाल तथा कुछ अन्य स्थानों पर ’पस्वा’ या ’धामी’ भी कहा जाता है यह भी देखा गया है कि धामी बनने का यह रिवाज पीढी दर पीढी चलता है अर्थात धामी की उमर हो जाने पर वही देवता धामी के पुत्र पर या परिवार के किसी अन्य सदस्य पर अवतरित होने लगता है धामी या पस्वा लोगो को कई तरह के परहेज रखने होते हैं सामान्यत: धामी लोग हाथ में “कङा” पहनते हैं, देवता शरीर में अवतरण से पहले और देवता के शरीर को मुक्त कर देने के बाद धामी सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगते हैं।
डंगरिया या धामी को समाज में मह्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है और सभी उसका आदर और सम्मान करते हैं। इस व्यक्ति की दिनचर्या हमारी तरह सामान्य नहीं होती, उसे रोज स्नान ध्यान कर पूजा करनी होती है, वह सभी जगह खा-पी नहीं सकता। यहां तक कि चाय पीने के लिये भी विशेष ध्यान उसे रखना होता है। उसे हमेशा शुद्ध ही रहना होता है अन्यथा देवता कुपित हो जाते हैं और उस व्यक्ति को दण्ड देते हैं ऎसी मान्यता है। जागर के वक्त भी डंगरिया गो-मूत्र, गंगाजल और गाय के दूध का सेवन कर, शुद्ध होकर ही धूणी में जाते हैं।

स्योंकार-स्योंनाई-
जिस घर में या घर के लोगों द्वारा जागर आयोजित की जाती है, उस घर के मुखिया को स्योंकार या सोन्कार और उसकी पत्नी को स्योंनाई कहा जाता है। यह अपनी समस्या देवता को बताते हैं और देवता के सामने चावल के दाने (जिसे दाणी भी कहते) रखते हैं, देवता चावल के दानों को हाथ में लेकर उनकी समस्या के बारे में जान लेते हैं और उसकी समस्या का कारण तथा समाधान बताते हैं।

जागर के लिये धूणी:-
जागर के लिये धूणी बनाना भी आवश्यक है, इसे बनाने के लिये लोग नहा-धोकर, पंडित जी की अगुवाई में शुद्धतापुर्वक एक शुद्ध स्थान का चयन करते हैं तथा वहां पर गौ-दान किया जाता है। फिर वहां पर गोलाकार भाग में थोड़ी सी खुदाई करके गड्ढा सा बना दिया जाता है जिससे वहां पर राख को एकत्र किया जा सके और वहां पर जलाने के लिए लकड़ियां रखी जाती हैं। लकड़ियों के चारों ओर गाय के गोबर और दीमक वाली मिट्टी ( यदि उपलब्ध न हो तो शुद्ध स्थान की लाल मिट्टी) से उसे लीपा जाता है। फ़िर धूणी में जागर लगाने से पहले स्योंकार द्वारा दीप जलाया जाता है, फिर शंखनाद कर धुणी को प्रज्जवलित किया जाता है। इस धूणी में तथा जागर लगने वाले स्थान पर किसी भी अशुद्ध व्यक्ति के जाने और जूता-चप्पल लेकर जाने का निषेध होता है।
जागर के संचालन का मुख्य कार्य जगरिया करता है और वह अपने व सहयोगियों के गायन-वादन से जागर को निम्न आठ चरणों (भागों) में पूर्ण कराता है:-
१- प्रथम चरण - सांझवाली गायन (संध्या वंदन)
२- दूसरा चरण- बिरत्वाई गायन (देवता की बिरुदावली गायन)
३- तीसरा चरण- औसाण (देवता के नृत्य करते समय का गायन व वादन)
४- चौथा चरण- हरिद्वार में गुरु की आरती करना
५- पांचवा चरण- खाक रमण
६- छठा चरण- दाणी का विचार करवाना
७- सातवाँ चरण आशीर्वाद दिलाना, संकट हरण का उपाय बताना, विघ्न-बाधाओं को मिटाना
८- आठवां चरण- देवता को अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत और हिमालय को प्रस्थान कराना
१- प्रथम चरण - सांझवाली गायन (संध्या वंदन)
जागर के प्रथम चरण में जगरिया हुड़्के या ढोल-दमाऊं के वादन के साथ सांझवाली का वर्णन करता है, इस गायन में जगरिया सभी देवी-देवताओं का नाम, उनके निवास स्थानों का नाम और संध्या के समय सम्पूर्ण प्रकृति एवं दैवी कार्यों के स्वतः प्राकृतिक रुप से संचालन का वर्णन करता है। सांझवाली गायन बड़ा लम्बा होता है, जिसे जगरिया धीरे-धीरे गाते हुये पूर्ण करता है। जब जागर का प्रथम चरण, सांझवाली पूर्ण होता है, इसे जगरिया द्वारा हुड़्के या ढोल-दमाऊं पर गाया जाता है। जगरिया वैसे तो कम पढ़ा लिखा या नितान्त अनपढ़ ही होता है, लेकिन अगर हम उसके द्वार गाई जाने वाली सांझवाली का विवेचन करें तो पता चलता है कि वह अन्तर्मन से कितना समृद्ध है। उसकी सांझवली का विस्त्तार तीनों लोकों तक है, जिसमें प्रकृति, ईशवर और हमारे स्थानीय देवताओं के विभिन्न स्वरुपों का विराट रुप में वर्णन है।
२- द्वितीय चरण- बिरत्वाई
इस चरण में जिस देवता की जागर लगाई जाती है या जिस देवता का आह्वान किया जाता है, उस देवता की उत्पत्ति, जीवनी और उसके द्वारा किये गये उन महत्वपूर्ण कार्यों का विवरण जगरिया अपने गायन में करता है। जिसे बिर्त्वाई कह्ते हैं अगर हम बिर्त्वाई शब्द के मूल में जायें तो इसका अर्थ वीरता प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें देवता की वीरता का बखान इस प्रकार किया जाता है कि उसे सामान्य स्तर के व्यक्ति से ऊपर उठाकर देवता बना दिया। इस प्रकार देवता को आह्वानित किया जाता है और जब बिरत्वाई अपने अंत पर पहुंचती है तो डंगरिया के शरीर में कम्पन होने लगता है, इसका अर्थ है कि उसके शरीर में देवता का अवतरण हो शुरु हो गया है, अब जगरिया बिरुदावली को बंद कर औसाण देने लगता है।
३- तृतीय चरण- औसान
इस समय तक डंगरिया के शरीर में देवता की आत्मा का प्रवेश हो चुका होता है तथा देवता को नाचने हेतु प्रेरित करने के लिए जगरिया औसाण देता है। औसान देते समय हुड़्के या अन्य वाद्य यंत्रो की गति बढ़ जाती है, औसान के सन्गीत से मन्त्रमुग्ध होकर देवता अपने पूर्णरुप एवं शक्ति के साथ धूणी के चारों ओर नाचने लगता है। औसाण का हर शब्द देवता में जोश पैदा करता है, इस समय डंगरिया ऎसे ऎसे कार्य कर देता है, जो वह अपने एक साधारण मनुस्य के वास्तविक रूप में कभी भी नही कर सकता। इसी से यह महसूस होता है कि डंगरिया के शरीर में कोई दिव्या शक्ति या देवात्मा प्रवेश कर जाती है।
४- चौथा चरण- गुरु की आरती
इस चरण में देवता द्वारा गुरु की आरती की जाती है, ऎसा माना जाता है कि हमारे सभी लोकदेवता पवित्र आत्मायें हैं। गुरु गोरखनाथ इनके गुरु हैं और इन सभी देवताओं ने कभी न कभी हरिद्वार जाकर कनखल में गुरु गोरखनाथ जी से दीक्षा ली है। तभी इनको गुरुमुखी देवता कहा जाता है, इस प्रसंग का वर्णन जगरिया अपने गायन द्वारा देवता के समक्ष करता है। इस समय नृत्य करते समय देवता के हाथ में थाली दे दी जाती है और थाली में चावल के दाने, राख, फूल और जली हुई घी की बाती रख दी जाती है, देवता नृत्य करते हुये थाली पकड़्कर अपने गुरुजी की आरती करते हैं।
५- पांचवा चरण- खाक या भिभूति (भभूत) रमाना
जागर के इस चरण में खाक रमाई जाती है, अपने गुरु की आरती के उपरान्त देवता द्वारा धूणी से राख निकाली जाती है। उसके बाद थाली में रखी हुई राख को देवता सबसे पहले अपने माथे पर लगाते हैं, उसके बाद जगरिया को फिर वाद्य यंत्रों पर राख लगाते हैं। इसके बाद वहां पर बैठे लोग क्रम से देवता के पास जाते हैं और देवता उनके माथे पर राख (भिभूत) लगाकर उनको आशीर्वाद देते हैं।
६- छठा चरण- दाणि का विचार
सभी को भिभूति लगाने के बाद जागर के छठे चरण में देवता स्योंकार की दाणि का विचार करते हैं। दाणी का विचार से मतलब है, जिस घर में देवता का अवतरण किया गया है, उस घर की परेशानी का कारण क्या है? इसी बात पर देवता विचार करते हैं, वह हाथ में चावल के दाने(दाणी) लेकर विचार करते हैं और परेशानी का कारण और उसका समाधान भी बताते हैं।
७- सातवां चरण- आशीर्वाद देना
स्योंकार-स्योंनाई की दाणी के विचार के बाद जागर के सातवें चरण में देवता स्योंकार-स्योंनाई को आश्वस्त करते हैं कि उन्होने उनके सभी कष्टों को अभी से हर लिया है। उनकी जागर की सफ़ल हुयी है तथा प्रसन्न होकर देवता द्वारा उनके सुखी पारिवारिक जीवन के लिये आशीर्वाद दिया जाता है। वहां पर बैठे सभी लोगों के लिये भी देवता मंगलकामना करते हुये उनको अशीर्वाद देते हैं।
८- आठवां चरण- देवता का अपने निवास के लिये प्रस्थान करना
यह चरण जागर का अंतिम चरण होता है, क्योंकि जिस कार्य के लिये जागर लगाई गई थी वह कार्य पूरा हो जाता है। देवताओं को सूक्ष्मरुपधारी माना गया है और ऎसा माना जाता है कि सभी देवता हिमालय में निवास करते हैं। अतः जगरिया अब अंतिम औसाण (अवसान) देता है और देवता अंतिम बार नाचते हैं और नाचते हुये खुशी खुशी अपने धाम की ओर वापस चले जाते हैं। जगरिया से वह इस बात का वादा करते हैं कि जब भी स्योंकार-स्योंनाई पर संकट होगा, उसके निवारण हेतु वह जरुर आयेंगे।देवता के अपने निवास को प्रस्थान के बाद देवता की आत्मा डंगरिया के शरीर को मुक्त कर देती है। इसके बाद डंगरिया के शरीर में कम्पन बंद हो जाता है और उनका शरीर निढ़ाल सा हो जाता है। थोडी देर लेटे रहने के बाद उन्हें फिर से गंगाजल, गो-मूत्र दिया जाता है, उसके बाद वह सामान्य रुप में आ जाते हैं। यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि जागर के समाप्त होने के उपरांत वह व्यक्ति जिसके शरीर में देवता अवतरित होते हैं (डंगरिया), अपने सामान्य रूप में आ जाता है तथा एक सामान्य मनुष्य की तरह ही व्यवहार करता है।
जागर एक पवित्र अनुष्ठान है, जिसमे यह माना जाता है कि देवताओं की आत्मा मनुष्य के शरीर में कुछ अवधि के लिए आकर आयोजनकर्ता के परिवार को आशीर्वाद प्रदान करती है। इसके आयोजन में साफ सफाई, सुचिता और पतित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। किसी भी प्रकार की त्रुटि होने या सुचिता का ध्यान न रखे जाने पर देवता के कोप का भागी होना पड़ सकता है।
एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ साथ जागर एक समृद्ध संगीत विधा भी है, इसी कारण उत्तराखंड के सभी लोक गायकों द्वारा जागर का गायन भी किया गया है। जिनकी Music CD बाजार में उपलब्ध है और आप इनको खरीदकर जागर के संगीत का आनंद प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यह संगीत मनोरंजन के लिए न होकर भक्ति भावना के साथ गाया और सुना जाता है। सुनने वालों को भी इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि इससे लोगों के धार्मिक विश्वास कि ठेस नही पहुंचनी चाहिए। क्योंक जागर एक पवित्र अनुष्ठान है इसलिए इसके गायन में भी उसी प्रकार की पवित्रता और सुचिता रखी जानी चाहिए जैसे उसके आयोजन के समय घरों में रखी जाती है।
एक बार देहरादून के परेड ग्राउंड में प्रसिद्ध लोक गायक श्री प्रीतम भर्तवान जी देवी जागर प्रस्तुत कर रहे थे। जो दर्शक इसकी समझ नही रखते वह उसे कोई फिल्मी गीत समझकर फिल्मी तरीके से नाच रहे थे, जिसे देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। ऐसे में इसको प्रस्तुत करने वालों को कम से कम इतना तो बताना चाहिए कि देवी जागर और एक फिल्मी गीत में क्या अन्तर है? परन्तु व्यावसायिकता के इस दौर में म्यूजिक कंपनियां और हमारे लोकगायक भी शायद अपनी जिम्मेदारी को उतने गंभीर रूप से नही ले रहे हैं। उनका उद्देश्य संस्कृति का प्रचार न होकर केवल व्यावसायिक होकर रह गया है इस समृद्ध धार्मिक अनुष्ठान एवं संगीत का प्रचार प्रसार अधिक से अधिक होना चाहिए परन्तु इसके वास्तविक स्वरुप के बारे में भी लोगों को जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही जागर जैसे पवित्र अनुष्ठान का के गायन वादन सार्वजनिक रूप से किसी फ़िल्मी तमाशे की तरह तो नही होना चाहिये।
आधुनिक पीढी के पढ़े- लिखे लोग अब जागर जैसी परम्पराओं पर कम ही विश्वास करते हैं और इसको अंधविश्वास मानते हैं। लेकिन उत्तराखंड में जागर लगाते हुये जिस प्रकार देवता का आह्वान किया जाता है, इस प्रकार के अनुष्ठान विश्व भर में किसी न किसी समय प्रचलित रहे है। व्यक्ति को माध्यम बना कर दैवीय शक्ति के आह्वान के उदाहरण मिश्र, चीन, जापान, अफ्रीका, ब्राजील आदि कई देशों में भी मिलते हैं। वैसे भी अंधविश्वास और श्रद्धा में बहुत थोडा सा ही अन्तर होता है, जिसे उसको जानने वाला ही महसूस आकर सकता है।
इस लेख का संकलन जागर के बारे में श्री पंकज सिंह महर जी तथा श्री हेम पन्त जी द्वारा जुटायी गयी महत्वपूर्ण जानकारी के आधार पर किया गया है। अगर आप जागर के बारे में अधिक जानने की ईच्छा रखते हैं तो निम्न लिंक पर मेरा पहाड़ फ़ोरम में शामिल होकर जागर के बारे में और विस्तार से जान सकते हैं। अगर आप जागर के सम्बन्ध में और जानकारी रखते हैं तो अपने विचार भी अन्य सदस्यों के साथ बांट सकते हैं।
http://www.merapahad.com/forum/index.php?topic=376.0
पाठको के विचार सदर आमंत्रित हैं, सभी को भगवान जागर के आयोजन के समान आशीर्वाद प्रदान करें! धन्यवाद्

गुरुवार, 26 जून 2008

कुमाऊँ में पूज्यनीय गोलू देवता या ग्वेलज्यू

उत्तराखंड राज्य का कुमाऊँ अंचल अपनी सुन्दरता तथा सांस्कृतिक विरासत के लिए पुरे विश्व में जाना जाता है हिंदू धर्म में प्रचलित देवी देवताओं के साथ साथ यहाँ पर स्थानीय देवी देवताओं के पूजन की परम्परा वर्षों से चली आ रही हैस्थानीय देवताओं में ग्वेलज्यु (गोलू देवता) का महत्वपूर्ण स्थान है तथा गोलू देवता के मन्दिर इस अंचल के हर स्थान पर स्थापित हैं
उत्तराखंड राज्य के कुमाऊँ मंडल में ग्वेलज्यू (गोलू देवता) इष्टदेव और न्यायाधीश के रुप में पूजे जातें हैं। इनको विभिन्न स्थानों पर कई नामो से जाना जाता है, जैसे गोरिल, गौरिया, ग्वेल, ग्वाल्ल या गोल भी कहते हैं। यह कुमाऊँ क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध व मान्य ग्राम-देवता है। वैसे तो इनके मंदिर ठौर-ठौर (कई स्थानों) में है, पर निम्न मन्दिर ज्यादा प्रसिद्ध हैं:-
बौरारौ पट्टी में चौड़, गुरुड़, भनारी गाँव में,
उच्चाकोट के बसोट गाँव में,
मल्ली डोटी में तड़खेत में,
पट्टी नया के मानिल में,
काली-कुमाऊँ के गोलचौड़, चम्पावत में,
पट्टी महर के कुमौड़ गाँव में,
कत्यूर में गागरगोल में, थान गाँव में,
हैड़ियागाँव(भीमताल के पास बिनायक तथा घोड़ाखाल),पट्टी छखाता नैनीताल में,
चौथान रानीबाग में,
चित्तई (अल्मोड़ा के पास) में।
भगवान् ग्वेलज्यू (गोलू देवता) के उपरोक्त मन्दिरों में से भी चितई (अल्मोड़ा), घोड़ाखाल (नैनीताल) तथा गोलचौड़ (चम्पावत) के मन्दिर ज्यादा प्रसिद्ध हैं।

भगवान् ग्वेलज्यू(गोलू देवता)मन्दिर चम्पावत

चम्पावत में ग्वेल ज्यू (गोलू देवता) का सबसे पुराना मंदिर काली-कुमाऊँ पट्टी के गोलचौड़ में स्थित है। यह स्थान भगवान गोलू (गोलज्यूँ) की जन्मस्थली भी मानी जाती है

भगवान् ग्वेलज्यू(गोलू देवता)मन्दिर घोडाखाल(नैनीताल)

ग्वेल ज्यू (गोलू देवता) का यह मंदिर नैनीताल जनपद की छखाता पट्टी में हैड़ियागाँव के निकट घोड़ाखाल नामक स्थान पर स्थित है तथा गोलू देवता के प्रसिद्ध तीन मन्दिरों में से एक है। इस मन्दिर तक पहुंचने के दो रास्ते हैं, एक सीधा रास्ता भवाली से सैनिक स्कूल होता हुआ मन्दिर तक पहुन्चता है, जोकि वाहनो के लिए एक सुगम मार्ग है। मन्दिर के लिए दूसरा रास्ता भीमताल के विनायक नामक स्थान से पैदल मार्ग के रूप में प्राचीन रास्त्ता है। विनायक में भी गोलू देवता का एक मन्दिर है जिसे छोटे गोलू देवता या स्थानीय कुमाऊनी भाषा में नान गोलज्यू के नाम से जाना जाता है। जो श्रद्धालु घोड़ाखाल मन्दिर तक किसी कारणवश नही जा पाते हैं तो यही पर गोलू देवता के दर्शन कर पुण्य प्राप्त करते हैं। घोड़ाखाल ग्वेलज्यू मंदिर जाने वाले श्रद्धालु भी पहले विनायक में देवता के दर्शन करने के उपरान्त ही गोलू देवता के दर्शनों का पुण्य प्राप्त करते हैं। अगर आप ट्रेकिंग के शोकीन हैं तो यहां से करीब ३ कि०मी० का पैदल पहाड़ी रास्त्ता तय कर आप करीब ४५ मिनट से १ घन्टे में घोड़ाखाल ग्वेलज्यू मंदिर पहुंच जायेंगे। यह मार्ग काफ़ी प्राचीन है तथा रास्ते में आप विभिन्न स्थानो से भीमताल घाटी के सुन्दर रूप का अवलोकन कर सकते हैं। यह मन्दिर पहाड़ की चोटी पर बांज के पेड़ों के बीच स्थित है जहां से भीमताल, भीमताल घाटी तथा नैनीताल के सुन्दर नजारों को देखा जा सकता है।

भगवान् ग्वेलज्यू(गोलू देवता)मन्दिर चितई (अल्मोड़ा)

उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले में अल्मोड़ा नगर के समीप चितई ग्राम में स्थित यह सबसे प्रसिद्ध मन्दिर कुमाऊंवासियों के साथ साथ अन्य श्र्द्धालुओं की भी लोक आस्थाओं का केन्द्र है। चितई में स्थित गोलू देवता का यह मंदिर अपने चमत्कारों के लिए सारे विश्व में जाना जाता है। न्याय के देवता के रुप में पूजे जाने वाले गोलू देवता का यह मंदिर हजारों घंटियों से ढका है। ये घंटियाँ लोग अपनी मन्नत पूरी हो जाने के बाद यहाँ आकर चढातें हैं। कोर्ट में लंबित मुकदमों में जीत के लिए लोग यहां आकर गुहार करतें हैं और माना जाता है कि गोलू देव दूध का दूध और पानी का पानी कर देतें हैं। आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग उनके इस न्याय को स्वीकार करता है। इस मंदिर में सारे साल कभी भी आकर पूजा की जा सकती है, देश ही नहीं विदेश से भी यहां आकर लोग मन्नत मांगते हैं तथा गोलू देवता की न्यायप्रियता को देखकर नत-मस्तक हो जातें हैं। क्योकि उनके जीवन की व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक सभी समस्याओं का हल गोलू देवता कर देतें हैं। मन्दिर में लोग अपनी समस्याओं को पत्र के रूप में यहां लिख जाते है और समाधान हो जाने पर गोलु देवता के मन्दिर में घन्टी चढ़ाकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। आम लोगों द्वारा गोलू देवता से न्याय की प्रत्याशा में लिखी गयी सैकड़ों चिट्ठीयां आप मन्दिर में टंकी हुयी देख सकते हैं। अवश्य ही ग्वैल देवता लोगों की फ़रियाद सुनते हैं तभी तो इतनी सारी घण्टियां मन्दिर परिसर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई जाती हैं।

भगवान् ग्वेलज्यू(गोलू देवता) की कथा भाग 1
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भगवान् ग्वेलज्यू(गोलू देवता) की कथा भाग 2
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सोमवार, 16 जून 2008

स्व गोपाल बाबू गोस्वामी जी के गीतो में पर्यावरण प्रेम व संरक्षण का सन्देश


मित्रो
स्व गोपाल बाबू गोस्वामी जी एक महान गायक एवं सन्गीतकार होने के साथ साथ समाज के प्रति बडा जागरुक थे। मैं यहां पर उनके द्वारा गाये और रचित गीतों के माध्यम से उनके पर्यावरण प्रेम के बारे में जानने व समझने का प्रयास करुंगा।
गोस्वामी जी को पहाड और पहाड़ के प्राकर्तिक स्वरूप से बड़ा प्यार था, उनके हर गीत में पहाड़ और उसका अंग प्रत्यंग एक नये रूप में उपस्थित होता है जैसे नीचे के गीत में गोस्वामी जी पहाड की हवा को गले लगने को कह रहे हैं, ये कुछ कुछ कालीदास के मेघदूत की याद दिलाता है, पर यहां सन्देशवाहक मेघ की जगह हवा है:-
ओ बयायी ऎ जा अन्ग्वायी ..............................................
O bayayi aija angwayi
O bayayi aija angw...
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इस गीत में देखिये कि किस प्रकार, उत्तराखण्ड व पहाड़ के पर्यावरण का जिक्र करते हुये गोस्वामी, जी लोगों से पहाड़ का ठण्डा पानी, फ़ल, फ़ूल और स्वस्थ हवा का आनन्द लेने को कह रहे हैं
पी जाओ पी जाओ मेरो पहाड़ को ठण्डो पानी..........................
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ऎसे ही एक गीत में गोस्वामी जी ने ऊत्तराखण्ड प्रदेश की प्रमुख नदी काली (शारदा) के सौन्दर्य का बडा सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया है:
काली गंगा को कालो पानी ...............................................
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अब देखिये इस गीत में गोस्वामी जी प्रक्रति के सौन्दर्य से प्रभावित होकर अपने आप को मानव रूप की बजाय प्रक्रति के किस रूप में देख्नना चाह रहे हैं:
चल रूपा हिलांसै कि जोडी बनी जुंला ...................................
Chal Rupa Hilasein ki Jodi Bani Jun lau
Chal Rupa Hilasein...
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गोस्वामी जी पहाड़ और पर्यावरण प्रेमी तो थे ही जोकि उनके गीतों से स्पष्ट है पर साथ ही वह पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी जागरूक थे। जैसे नीचे के गीत में गोस्वामी जी बान्ज के जंगल को न काटने का सन्देश दे रहे हैं:-
सरकारी जंगल लछिमा बान्ज नी काट लछिमा बान्ज नी काटा.....
इसी प्रकार इस गीत में गोस्वामी जी की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरुकता प्रदर्शित होती है:-
आज यौ मेरी सुन लो पुकारा, धाद लगौं छ यौ गोपाला................
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इस प्रकार हम कह सकते हैं कि गोस्वामी जी पर्यावरण तथा उसमें हो रहे बद्लावों के प्रति समाज को सचेत करने का कार्य तभी शुरु कर चुके थे जब हमारी सरकार तथा समाज का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग सोया हुवा था। यहां पर मैंने गोस्वामी जी के पर्यावरण प्रेम से सम्बन्धित गीतो के बारे उल्लेख किया है, पर गोस्वामी जी का हर गीत कुछ न कुछ सन्देश अवश्य प्रदान करता है। आ़गे हम गोस्वामी जी के गीतों के माध्यम से पहाड़ी समाज के अन्य सरोकारों को भी जानने का प्रयास करेंगे।
एक महान कलाकार वही है जो अपनी कला के माध्यम से केवल समाज का मनोरन्जन ही ना करे बल्कि समाज के प्रति अपने अन्य दायित्वों को भी समझे तथा समाज को उसके प्रति अपनी कला के माध्यम से जागरूक करे। गोस्वामी जी ने जिस प्रकार एक बहुत ही साधारण जीवनशैली में जीवन निर्वाह करते हुये अपनी कला के माध्यम से पूरे समाज को मनोरन्जन के साथ साथ उनके सामाजिक उत्तर्दायित्वों का जो सन्देश दिया है वह उनको उत्तराखण्ड ही नही देश के महान कलाकरों की श्रेणी में रखता है।

गुरुवार, 12 जून 2008

स्व गोपाल बाबु गोस्वामी जी के सदाबहार सुमधुर गीत

मित्रों
कुमाऊँ में शायद ही कोई ऐसा होगा जो स्व गोपाल बाबु गोस्वामी जी के नाम से अपरिचित हो! गोस्वामी जी के सुमधुर गीतों को सुनकर कौन नही कुमाऊँ की सुरम्य वादियों में खो न जाता हो! लेकिन आजकल स्व गोस्वामीजी के गीतों को मूल रूप में प्राप्त करना बड़ा मुश्किल है इसी समस्या के चलते मैंने अपने एक परिचित के सहयोग से गोस्वामी जी के करीब ७५ पुरानो गीतों को एकत्र कर उन गीतों को mp3 format में बदल कर इंटरनेट पर अपलोड कर दिया जिससे गोस्वामी जी के गीतों के प्रशंसक कम से कम उन गीतों की झलक प्राप्त कर सकें तहत नए लोग भी उनकी आवाज से परिचित हो सकें पुराने होने के कारन ये गीत गोस्वामी जी की सुमधुर वाणी को साकार टू नही कर सकते हैं, नही आजकल के संगीत की तकनीकी से मुकाबला कर सकते हैं
मेरा उद्देश्य किसी के व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुँचने का भी नही है, मैं केवल उस महान गायक की आवाज को आप पाठकों तक पहुँचाना चाहता हूँ
कृपया नीचे के लिंक पर जाकर क्लीक करें:-
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इस संग्रह में से गोस्वामी जी के कुछ प्रसिद्ध गीत मैं यहाँ नीचे भी आपके लिए दे रहा हूँ:-मुझे आशा है आप लोग जरुर गोस्वामी जी के गीतों का रसास्वादन करेंगे

Bati gye barat cheli bhait doli ma
Bati gye barat che...
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Meri Durga Harei Gyei
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Aaj Kala Ghar Ghar Chaha Chusa Chusa
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