सोमवार, 30 जून 2008

जागर - उत्तराखंड में देवताओं के आह्वान का पवित्र अनुष्ठान

सभी जानते हैं कि उत्तराखंड प्रदेश को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है, ऐसा माना जाता है कि इस अंचल के कण-कण में देवी देवता निवास करते हैं। उत्तराखण्ड देवाधिदेव महादेव भगवान् शिव का घर (कैलाश पर्वत) भी है और ससुराल (कनखल, हरिद्वार) भी हमारे वेद-पुराणों में भी सभी देवी-देवताओं का निवास हिमालय के उत्तराखण्ड अंचल में ही माना गया है। उत्तराखण्ड में शिव मन्दिर प्रायः हर स्थान पर पाए जाते है इसीलिए यहाँ के बारे में कहा जाता है कि, "जितने कंकर, उतने शंकर"। सभी हिंदू देवी देवताओं की आराधना के साथ साथ यहाँ पर स्थानीय रूप से पूजे जाने वाले कई देवी-देवताओं का भी यहाँ की संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है
जागर शुद्ध संस्कृत शब्द है जो जाग के साथ घल् प्रत्यय लगाकर बना है उसका अर्थ है जागरण उत्तराखंडवासियों का ऐसा विश्वास है कि देवी-देवता अपने भक्तों का हर कष्ट का निवारण करने के लिये हमारे पास आते हैं देवताओं की की आत्मा के किसी पवित्र शरीर के माध्यम से कुछ समय के लिए अवतरित होने की इसी प्रक्रिया को कहा जाता है- "जागर"। जागर शायद जागरण का ही अपभ्रंश हो सकता है क्योंकि जागर का आयोजन सामान्यतया रात्रि में ही होता है। लेकिन जिस रूप में इसका आयोजन किया जाता है उसके अनुसार जागर से अभिप्राय एक ऎसे रात्रि जागरण या जगराते के आयोजन से है जहां एक अदृश्य आत्मा (देवी-देवताओं) को जागृत कर उसका आह्वान कर उसे किसी व्यक्ति के शरीर में अवतरित किया जाता है।
इस प्रकार गूढ़ अर्थ में जागरण से अभिप्राय केवल जागने से ना होकर देवता की आत्मा को जागृत करने तथा उसे किसी व्यक्ति में (जिसे डंगरिया कहते हैं) में अवतरित कराने से है। इस कार्य के लिये जागरिया जागर लगाता है तथा देवता के आह्ववान हेतु देवता की जीवनी और उसके द्वारा किये कार्यों का बखान अपने साथी गाजे बाजे वालों के साथ गाते हुये करता है। जगर में वाद्य यंत्रों के रूप में हमारे लोक वाद्य हुड़्का और कांसे की थाली का प्रमुख रुप से प्रयोग किया जाता है। इन गीतों को जागर कहने का तर्क यह है कि इनमें देवी शक्ति को जाग्रत करने का आह्वान होता है, इसलिये इनका प्रारंभ जागने-जगाने के उद्बोधन से होता है
अवधि के अनुसार जागर कई प्रकार की होती है:-
सामान्य जागर एक दिन (रात्रि में) की होती है
विशेष प्रयोजन हेतु चार दिन तक आयोजित की जाने वाली जागर के इस कार्यक्रम को चौरास कहते हैं। बैसी- बाईस दिन लगातार आयोजित की जागर के कार्यक्रम को बैसी कहते हैं। यह किसी बड़े परिवारसमूह के द्वारा सामूहिक रूप से आयोजित की जाती है

स्थान के अनुसार जागर घर के अंदर तथा घर के बाहर या मंदिरों में बने विशेष स्थल पर आयोजित की जाती है
आयोजित किए जाने उद्देश्य के अनुसार जागर दो प्रकार की होती है:
एक जागर जो जिसका आयोजन देवी देवताओ या अपने ईष्ट की आराधना के लिए होता है
दूसरी जागर किसी मृत आत्मा (जैसे के किसी पूर्वज जिसकी अकाल मृत्यु हुयी हो और अंतिम संस्कार विधिपुर्वक न हुआ हो) की शान्ति के लिए!
जागर के संचालन में मुख्य रुप से निम्न लोग शामिल होते है:-
१- जगरिया या धौंसिया
२- डंगरिया
३- स्योंकार-स्योंने या सोंकार
४- गाजेबाजे वाले - जो जगरिया के साथ गायन में तथा वाद्ययंत्रों के संगीत से सहयोग करते हैं।
इनके अतिरिक्त स्योंकार के घर के अन्य सदस्य, सम्बन्धी, मित्रगण व गांव पड़ोस के लोग भी जागर में दर्शक की तरह शामिल होते हैं तथा देवता से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
जगरिया या धौंसिया-
जगरिया या धौंसिया उस व्यक्ति को कहा जाता है जो अदृश्य आत्मा को जागृत करता है, इसका कार्य देवता की जीवनी, उसके जीवन की प्रमुख घटनायें व उसके प्रमुख मानवीय गुणों को लोक वाद्य के साथ एक विशेष शैली में गाकर देवता को जागृत कर उसका अवतरण डंगरिया से शरीर में कराना होता है।यह देवता (जोकि डंगरिया के शरीर में अवतरित होते हैं) को प्रज्जलित धूनी के चारों ओर चलाता है और उससे जागर लगवाने वाले की मनोकामना पूर्ण करने का अनुरोध करता है। यह कार्य मुख्यतः हरिजन लोग करते हैं और यह समाज का सम्मानीय व्यक्ति होता है, इसके लिये जागर लगवाने वाला व्यक्ति नये वस्त्र और सफेद साफा लेकर आता है और यह उन्हें पहन कर यह कार्य करता है। जगरिया को भी खान-पान और छूत आदि का भी ध्यान रखना होता है।
डंगरिया, पश्वा या धामी-
डंगरिया वह व्यक्ति होता है, जिसके शरीर में देवता का अवतरण होता है, इसे डगर (रास्ता) बताने वाला माना जाता है, इसलिये इसे डंगरिया कहा जाता है। जब डंगरिया के शरीर में देवता का अवतरण हो जाता है है तो उसका पूरा शरीर कांपता है और वह सभी दुःखी लोगों की समस्याओं के समाधान बताता है, उसे उस समय देवता की तरह ही शक्ति संपन्न और सर्वफलदायी माना जाता है।
डंगरिया को गढ़वाल तथा कुछ अन्य स्थानों पर ’पस्वा’ या ’धामी’ भी कहा जाता है यह भी देखा गया है कि धामी बनने का यह रिवाज पीढी दर पीढी चलता है अर्थात धामी की उमर हो जाने पर वही देवता धामी के पुत्र पर या परिवार के किसी अन्य सदस्य पर अवतरित होने लगता है धामी या पस्वा लोगो को कई तरह के परहेज रखने होते हैं सामान्यत: धामी लोग हाथ में “कङा” पहनते हैं, देवता शरीर में अवतरण से पहले और देवता के शरीर को मुक्त कर देने के बाद धामी सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगते हैं।
डंगरिया या धामी को समाज में मह्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है और सभी उसका आदर और सम्मान करते हैं। इस व्यक्ति की दिनचर्या हमारी तरह सामान्य नहीं होती, उसे रोज स्नान ध्यान कर पूजा करनी होती है, वह सभी जगह खा-पी नहीं सकता। यहां तक कि चाय पीने के लिये भी विशेष ध्यान उसे रखना होता है। उसे हमेशा शुद्ध ही रहना होता है अन्यथा देवता कुपित हो जाते हैं और उस व्यक्ति को दण्ड देते हैं ऎसी मान्यता है। जागर के वक्त भी डंगरिया गो-मूत्र, गंगाजल और गाय के दूध का सेवन कर, शुद्ध होकर ही धूणी में जाते हैं।

स्योंकार-स्योंनाई-
जिस घर में या घर के लोगों द्वारा जागर आयोजित की जाती है, उस घर के मुखिया को स्योंकार या सोन्कार और उसकी पत्नी को स्योंनाई कहा जाता है। यह अपनी समस्या देवता को बताते हैं और देवता के सामने चावल के दाने (जिसे दाणी भी कहते) रखते हैं, देवता चावल के दानों को हाथ में लेकर उनकी समस्या के बारे में जान लेते हैं और उसकी समस्या का कारण तथा समाधान बताते हैं।

जागर के लिये धूणी:-
जागर के लिये धूणी बनाना भी आवश्यक है, इसे बनाने के लिये लोग नहा-धोकर, पंडित जी की अगुवाई में शुद्धतापुर्वक एक शुद्ध स्थान का चयन करते हैं तथा वहां पर गौ-दान किया जाता है। फिर वहां पर गोलाकार भाग में थोड़ी सी खुदाई करके गड्ढा सा बना दिया जाता है जिससे वहां पर राख को एकत्र किया जा सके और वहां पर जलाने के लिए लकड़ियां रखी जाती हैं। लकड़ियों के चारों ओर गाय के गोबर और दीमक वाली मिट्टी ( यदि उपलब्ध न हो तो शुद्ध स्थान की लाल मिट्टी) से उसे लीपा जाता है। फ़िर धूणी में जागर लगाने से पहले स्योंकार द्वारा दीप जलाया जाता है, फिर शंखनाद कर धुणी को प्रज्जवलित किया जाता है। इस धूणी में तथा जागर लगने वाले स्थान पर किसी भी अशुद्ध व्यक्ति के जाने और जूता-चप्पल लेकर जाने का निषेध होता है।
जागर के संचालन का मुख्य कार्य जगरिया करता है और वह अपने व सहयोगियों के गायन-वादन से जागर को निम्न आठ चरणों (भागों) में पूर्ण कराता है:-
१- प्रथम चरण - सांझवाली गायन (संध्या वंदन)
२- दूसरा चरण- बिरत्वाई गायन (देवता की बिरुदावली गायन)
३- तीसरा चरण- औसाण (देवता के नृत्य करते समय का गायन व वादन)
४- चौथा चरण- हरिद्वार में गुरु की आरती करना
५- पांचवा चरण- खाक रमण
६- छठा चरण- दाणी का विचार करवाना
७- सातवाँ चरण आशीर्वाद दिलाना, संकट हरण का उपाय बताना, विघ्न-बाधाओं को मिटाना
८- आठवां चरण- देवता को अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत और हिमालय को प्रस्थान कराना
१- प्रथम चरण - सांझवाली गायन (संध्या वंदन)
जागर के प्रथम चरण में जगरिया हुड़्के या ढोल-दमाऊं के वादन के साथ सांझवाली का वर्णन करता है, इस गायन में जगरिया सभी देवी-देवताओं का नाम, उनके निवास स्थानों का नाम और संध्या के समय सम्पूर्ण प्रकृति एवं दैवी कार्यों के स्वतः प्राकृतिक रुप से संचालन का वर्णन करता है। सांझवाली गायन बड़ा लम्बा होता है, जिसे जगरिया धीरे-धीरे गाते हुये पूर्ण करता है। जब जागर का प्रथम चरण, सांझवाली पूर्ण होता है, इसे जगरिया द्वारा हुड़्के या ढोल-दमाऊं पर गाया जाता है। जगरिया वैसे तो कम पढ़ा लिखा या नितान्त अनपढ़ ही होता है, लेकिन अगर हम उसके द्वार गाई जाने वाली सांझवाली का विवेचन करें तो पता चलता है कि वह अन्तर्मन से कितना समृद्ध है। उसकी सांझवली का विस्त्तार तीनों लोकों तक है, जिसमें प्रकृति, ईशवर और हमारे स्थानीय देवताओं के विभिन्न स्वरुपों का विराट रुप में वर्णन है।
२- द्वितीय चरण- बिरत्वाई
इस चरण में जिस देवता की जागर लगाई जाती है या जिस देवता का आह्वान किया जाता है, उस देवता की उत्पत्ति, जीवनी और उसके द्वारा किये गये उन महत्वपूर्ण कार्यों का विवरण जगरिया अपने गायन में करता है। जिसे बिर्त्वाई कह्ते हैं अगर हम बिर्त्वाई शब्द के मूल में जायें तो इसका अर्थ वीरता प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें देवता की वीरता का बखान इस प्रकार किया जाता है कि उसे सामान्य स्तर के व्यक्ति से ऊपर उठाकर देवता बना दिया। इस प्रकार देवता को आह्वानित किया जाता है और जब बिरत्वाई अपने अंत पर पहुंचती है तो डंगरिया के शरीर में कम्पन होने लगता है, इसका अर्थ है कि उसके शरीर में देवता का अवतरण हो शुरु हो गया है, अब जगरिया बिरुदावली को बंद कर औसाण देने लगता है।
३- तृतीय चरण- औसान
इस समय तक डंगरिया के शरीर में देवता की आत्मा का प्रवेश हो चुका होता है तथा देवता को नाचने हेतु प्रेरित करने के लिए जगरिया औसाण देता है। औसान देते समय हुड़्के या अन्य वाद्य यंत्रो की गति बढ़ जाती है, औसान के सन्गीत से मन्त्रमुग्ध होकर देवता अपने पूर्णरुप एवं शक्ति के साथ धूणी के चारों ओर नाचने लगता है। औसाण का हर शब्द देवता में जोश पैदा करता है, इस समय डंगरिया ऎसे ऎसे कार्य कर देता है, जो वह अपने एक साधारण मनुस्य के वास्तविक रूप में कभी भी नही कर सकता। इसी से यह महसूस होता है कि डंगरिया के शरीर में कोई दिव्या शक्ति या देवात्मा प्रवेश कर जाती है।
४- चौथा चरण- गुरु की आरती
इस चरण में देवता द्वारा गुरु की आरती की जाती है, ऎसा माना जाता है कि हमारे सभी लोकदेवता पवित्र आत्मायें हैं। गुरु गोरखनाथ इनके गुरु हैं और इन सभी देवताओं ने कभी न कभी हरिद्वार जाकर कनखल में गुरु गोरखनाथ जी से दीक्षा ली है। तभी इनको गुरुमुखी देवता कहा जाता है, इस प्रसंग का वर्णन जगरिया अपने गायन द्वारा देवता के समक्ष करता है। इस समय नृत्य करते समय देवता के हाथ में थाली दे दी जाती है और थाली में चावल के दाने, राख, फूल और जली हुई घी की बाती रख दी जाती है, देवता नृत्य करते हुये थाली पकड़्कर अपने गुरुजी की आरती करते हैं।
५- पांचवा चरण- खाक या भिभूति (भभूत) रमाना
जागर के इस चरण में खाक रमाई जाती है, अपने गुरु की आरती के उपरान्त देवता द्वारा धूणी से राख निकाली जाती है। उसके बाद थाली में रखी हुई राख को देवता सबसे पहले अपने माथे पर लगाते हैं, उसके बाद जगरिया को फिर वाद्य यंत्रों पर राख लगाते हैं। इसके बाद वहां पर बैठे लोग क्रम से देवता के पास जाते हैं और देवता उनके माथे पर राख (भिभूत) लगाकर उनको आशीर्वाद देते हैं।
६- छठा चरण- दाणि का विचार
सभी को भिभूति लगाने के बाद जागर के छठे चरण में देवता स्योंकार की दाणि का विचार करते हैं। दाणी का विचार से मतलब है, जिस घर में देवता का अवतरण किया गया है, उस घर की परेशानी का कारण क्या है? इसी बात पर देवता विचार करते हैं, वह हाथ में चावल के दाने(दाणी) लेकर विचार करते हैं और परेशानी का कारण और उसका समाधान भी बताते हैं।
७- सातवां चरण- आशीर्वाद देना
स्योंकार-स्योंनाई की दाणी के विचार के बाद जागर के सातवें चरण में देवता स्योंकार-स्योंनाई को आश्वस्त करते हैं कि उन्होने उनके सभी कष्टों को अभी से हर लिया है। उनकी जागर की सफ़ल हुयी है तथा प्रसन्न होकर देवता द्वारा उनके सुखी पारिवारिक जीवन के लिये आशीर्वाद दिया जाता है। वहां पर बैठे सभी लोगों के लिये भी देवता मंगलकामना करते हुये उनको अशीर्वाद देते हैं।
८- आठवां चरण- देवता का अपने निवास के लिये प्रस्थान करना
यह चरण जागर का अंतिम चरण होता है, क्योंकि जिस कार्य के लिये जागर लगाई गई थी वह कार्य पूरा हो जाता है। देवताओं को सूक्ष्मरुपधारी माना गया है और ऎसा माना जाता है कि सभी देवता हिमालय में निवास करते हैं। अतः जगरिया अब अंतिम औसाण (अवसान) देता है और देवता अंतिम बार नाचते हैं और नाचते हुये खुशी खुशी अपने धाम की ओर वापस चले जाते हैं। जगरिया से वह इस बात का वादा करते हैं कि जब भी स्योंकार-स्योंनाई पर संकट होगा, उसके निवारण हेतु वह जरुर आयेंगे।देवता के अपने निवास को प्रस्थान के बाद देवता की आत्मा डंगरिया के शरीर को मुक्त कर देती है। इसके बाद डंगरिया के शरीर में कम्पन बंद हो जाता है और उनका शरीर निढ़ाल सा हो जाता है। थोडी देर लेटे रहने के बाद उन्हें फिर से गंगाजल, गो-मूत्र दिया जाता है, उसके बाद वह सामान्य रुप में आ जाते हैं। यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि जागर के समाप्त होने के उपरांत वह व्यक्ति जिसके शरीर में देवता अवतरित होते हैं (डंगरिया), अपने सामान्य रूप में आ जाता है तथा एक सामान्य मनुष्य की तरह ही व्यवहार करता है।
जागर एक पवित्र अनुष्ठान है, जिसमे यह माना जाता है कि देवताओं की आत्मा मनुष्य के शरीर में कुछ अवधि के लिए आकर आयोजनकर्ता के परिवार को आशीर्वाद प्रदान करती है। इसके आयोजन में साफ सफाई, सुचिता और पतित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। किसी भी प्रकार की त्रुटि होने या सुचिता का ध्यान न रखे जाने पर देवता के कोप का भागी होना पड़ सकता है।
एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ साथ जागर एक समृद्ध संगीत विधा भी है, इसी कारण उत्तराखंड के सभी लोक गायकों द्वारा जागर का गायन भी किया गया है। जिनकी Music CD बाजार में उपलब्ध है और आप इनको खरीदकर जागर के संगीत का आनंद प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यह संगीत मनोरंजन के लिए न होकर भक्ति भावना के साथ गाया और सुना जाता है। सुनने वालों को भी इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि इससे लोगों के धार्मिक विश्वास कि ठेस नही पहुंचनी चाहिए। क्योंक जागर एक पवित्र अनुष्ठान है इसलिए इसके गायन में भी उसी प्रकार की पवित्रता और सुचिता रखी जानी चाहिए जैसे उसके आयोजन के समय घरों में रखी जाती है।
एक बार देहरादून के परेड ग्राउंड में प्रसिद्ध लोक गायक श्री प्रीतम भर्तवान जी देवी जागर प्रस्तुत कर रहे थे। जो दर्शक इसकी समझ नही रखते वह उसे कोई फिल्मी गीत समझकर फिल्मी तरीके से नाच रहे थे, जिसे देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। ऐसे में इसको प्रस्तुत करने वालों को कम से कम इतना तो बताना चाहिए कि देवी जागर और एक फिल्मी गीत में क्या अन्तर है? परन्तु व्यावसायिकता के इस दौर में म्यूजिक कंपनियां और हमारे लोकगायक भी शायद अपनी जिम्मेदारी को उतने गंभीर रूप से नही ले रहे हैं। उनका उद्देश्य संस्कृति का प्रचार न होकर केवल व्यावसायिक होकर रह गया है इस समृद्ध धार्मिक अनुष्ठान एवं संगीत का प्रचार प्रसार अधिक से अधिक होना चाहिए परन्तु इसके वास्तविक स्वरुप के बारे में भी लोगों को जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही जागर जैसे पवित्र अनुष्ठान का के गायन वादन सार्वजनिक रूप से किसी फ़िल्मी तमाशे की तरह तो नही होना चाहिये।
आधुनिक पीढी के पढ़े- लिखे लोग अब जागर जैसी परम्पराओं पर कम ही विश्वास करते हैं और इसको अंधविश्वास मानते हैं। लेकिन उत्तराखंड में जागर लगाते हुये जिस प्रकार देवता का आह्वान किया जाता है, इस प्रकार के अनुष्ठान विश्व भर में किसी न किसी समय प्रचलित रहे है। व्यक्ति को माध्यम बना कर दैवीय शक्ति के आह्वान के उदाहरण मिश्र, चीन, जापान, अफ्रीका, ब्राजील आदि कई देशों में भी मिलते हैं। वैसे भी अंधविश्वास और श्रद्धा में बहुत थोडा सा ही अन्तर होता है, जिसे उसको जानने वाला ही महसूस आकर सकता है।
इस लेख का संकलन जागर के बारे में श्री पंकज सिंह महर जी तथा श्री हेम पन्त जी द्वारा जुटायी गयी महत्वपूर्ण जानकारी के आधार पर किया गया है। अगर आप जागर के बारे में अधिक जानने की ईच्छा रखते हैं तो निम्न लिंक पर मेरा पहाड़ फ़ोरम में शामिल होकर जागर के बारे में और विस्तार से जान सकते हैं। अगर आप जागर के सम्बन्ध में और जानकारी रखते हैं तो अपने विचार भी अन्य सदस्यों के साथ बांट सकते हैं।
http://www.merapahad.com/forum/index.php?topic=376.0
पाठको के विचार सदर आमंत्रित हैं, सभी को भगवान जागर के आयोजन के समान आशीर्वाद प्रदान करें! धन्यवाद्

गुरुवार, 26 जून 2008

कुमाऊँ में पूज्यनीय गोलू देवता या ग्वेलज्यू

उत्तराखंड राज्य का कुमाऊँ अंचल अपनी सुन्दरता तथा सांस्कृतिक विरासत के लिए पुरे विश्व में जाना जाता है हिंदू धर्म में प्रचलित देवी देवताओं के साथ साथ यहाँ पर स्थानीय देवी देवताओं के पूजन की परम्परा वर्षों से चली आ रही हैस्थानीय देवताओं में ग्वेलज्यु (गोलू देवता) का महत्वपूर्ण स्थान है तथा गोलू देवता के मन्दिर इस अंचल के हर स्थान पर स्थापित हैं
उत्तराखंड राज्य के कुमाऊँ मंडल में ग्वेलज्यू (गोलू देवता) इष्टदेव और न्यायाधीश के रुप में पूजे जातें हैं। इनको विभिन्न स्थानों पर कई नामो से जाना जाता है, जैसे गोरिल, गौरिया, ग्वेल, ग्वाल्ल या गोल भी कहते हैं। यह कुमाऊँ क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध व मान्य ग्राम-देवता है। वैसे तो इनके मंदिर ठौर-ठौर (कई स्थानों) में है, पर निम्न मन्दिर ज्यादा प्रसिद्ध हैं:-
बौरारौ पट्टी में चौड़, गुरुड़, भनारी गाँव में,
उच्चाकोट के बसोट गाँव में,
मल्ली डोटी में तड़खेत में,
पट्टी नया के मानिल में,
काली-कुमाऊँ के गोलचौड़, चम्पावत में,
पट्टी महर के कुमौड़ गाँव में,
कत्यूर में गागरगोल में, थान गाँव में,
हैड़ियागाँव(भीमताल के पास बिनायक तथा घोड़ाखाल),पट्टी छखाता नैनीताल में,
चौथान रानीबाग में,
चित्तई (अल्मोड़ा के पास) में।
भगवान् ग्वेलज्यू (गोलू देवता) के उपरोक्त मन्दिरों में से भी चितई (अल्मोड़ा), घोड़ाखाल (नैनीताल) तथा गोलचौड़ (चम्पावत) के मन्दिर ज्यादा प्रसिद्ध हैं।

भगवान् ग्वेलज्यू(गोलू देवता)मन्दिर चम्पावत

चम्पावत में ग्वेल ज्यू (गोलू देवता) का सबसे पुराना मंदिर काली-कुमाऊँ पट्टी के गोलचौड़ में स्थित है। यह स्थान भगवान गोलू (गोलज्यूँ) की जन्मस्थली भी मानी जाती है

भगवान् ग्वेलज्यू(गोलू देवता)मन्दिर घोडाखाल(नैनीताल)

ग्वेल ज्यू (गोलू देवता) का यह मंदिर नैनीताल जनपद की छखाता पट्टी में हैड़ियागाँव के निकट घोड़ाखाल नामक स्थान पर स्थित है तथा गोलू देवता के प्रसिद्ध तीन मन्दिरों में से एक है। इस मन्दिर तक पहुंचने के दो रास्ते हैं, एक सीधा रास्ता भवाली से सैनिक स्कूल होता हुआ मन्दिर तक पहुन्चता है, जोकि वाहनो के लिए एक सुगम मार्ग है। मन्दिर के लिए दूसरा रास्ता भीमताल के विनायक नामक स्थान से पैदल मार्ग के रूप में प्राचीन रास्त्ता है। विनायक में भी गोलू देवता का एक मन्दिर है जिसे छोटे गोलू देवता या स्थानीय कुमाऊनी भाषा में नान गोलज्यू के नाम से जाना जाता है। जो श्रद्धालु घोड़ाखाल मन्दिर तक किसी कारणवश नही जा पाते हैं तो यही पर गोलू देवता के दर्शन कर पुण्य प्राप्त करते हैं। घोड़ाखाल ग्वेलज्यू मंदिर जाने वाले श्रद्धालु भी पहले विनायक में देवता के दर्शन करने के उपरान्त ही गोलू देवता के दर्शनों का पुण्य प्राप्त करते हैं। अगर आप ट्रेकिंग के शोकीन हैं तो यहां से करीब ३ कि०मी० का पैदल पहाड़ी रास्त्ता तय कर आप करीब ४५ मिनट से १ घन्टे में घोड़ाखाल ग्वेलज्यू मंदिर पहुंच जायेंगे। यह मार्ग काफ़ी प्राचीन है तथा रास्ते में आप विभिन्न स्थानो से भीमताल घाटी के सुन्दर रूप का अवलोकन कर सकते हैं। यह मन्दिर पहाड़ की चोटी पर बांज के पेड़ों के बीच स्थित है जहां से भीमताल, भीमताल घाटी तथा नैनीताल के सुन्दर नजारों को देखा जा सकता है।

भगवान् ग्वेलज्यू(गोलू देवता)मन्दिर चितई (अल्मोड़ा)

उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले में अल्मोड़ा नगर के समीप चितई ग्राम में स्थित यह सबसे प्रसिद्ध मन्दिर कुमाऊंवासियों के साथ साथ अन्य श्र्द्धालुओं की भी लोक आस्थाओं का केन्द्र है। चितई में स्थित गोलू देवता का यह मंदिर अपने चमत्कारों के लिए सारे विश्व में जाना जाता है। न्याय के देवता के रुप में पूजे जाने वाले गोलू देवता का यह मंदिर हजारों घंटियों से ढका है। ये घंटियाँ लोग अपनी मन्नत पूरी हो जाने के बाद यहाँ आकर चढातें हैं। कोर्ट में लंबित मुकदमों में जीत के लिए लोग यहां आकर गुहार करतें हैं और माना जाता है कि गोलू देव दूध का दूध और पानी का पानी कर देतें हैं। आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग उनके इस न्याय को स्वीकार करता है। इस मंदिर में सारे साल कभी भी आकर पूजा की जा सकती है, देश ही नहीं विदेश से भी यहां आकर लोग मन्नत मांगते हैं तथा गोलू देवता की न्यायप्रियता को देखकर नत-मस्तक हो जातें हैं। क्योकि उनके जीवन की व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक सभी समस्याओं का हल गोलू देवता कर देतें हैं। मन्दिर में लोग अपनी समस्याओं को पत्र के रूप में यहां लिख जाते है और समाधान हो जाने पर गोलु देवता के मन्दिर में घन्टी चढ़ाकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। आम लोगों द्वारा गोलू देवता से न्याय की प्रत्याशा में लिखी गयी सैकड़ों चिट्ठीयां आप मन्दिर में टंकी हुयी देख सकते हैं। अवश्य ही ग्वैल देवता लोगों की फ़रियाद सुनते हैं तभी तो इतनी सारी घण्टियां मन्दिर परिसर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई जाती हैं।

भगवान् ग्वेलज्यू(गोलू देवता) की कथा भाग 1
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भगवान् ग्वेलज्यू(गोलू देवता) की कथा भाग 2
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सोमवार, 16 जून 2008

स्व गोपाल बाबू गोस्वामी जी के गीतो में पर्यावरण प्रेम व संरक्षण का सन्देश


मित्रो
स्व गोपाल बाबू गोस्वामी जी एक महान गायक एवं सन्गीतकार होने के साथ साथ समाज के प्रति बडा जागरुक थे। मैं यहां पर उनके द्वारा गाये और रचित गीतों के माध्यम से उनके पर्यावरण प्रेम के बारे में जानने व समझने का प्रयास करुंगा।
गोस्वामी जी को पहाड और पहाड़ के प्राकर्तिक स्वरूप से बड़ा प्यार था, उनके हर गीत में पहाड़ और उसका अंग प्रत्यंग एक नये रूप में उपस्थित होता है जैसे नीचे के गीत में गोस्वामी जी पहाड की हवा को गले लगने को कह रहे हैं, ये कुछ कुछ कालीदास के मेघदूत की याद दिलाता है, पर यहां सन्देशवाहक मेघ की जगह हवा है:-
ओ बयायी ऎ जा अन्ग्वायी ..............................................
O bayayi aija angwayi
O bayayi aija angw...
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इस गीत में देखिये कि किस प्रकार, उत्तराखण्ड व पहाड़ के पर्यावरण का जिक्र करते हुये गोस्वामी, जी लोगों से पहाड़ का ठण्डा पानी, फ़ल, फ़ूल और स्वस्थ हवा का आनन्द लेने को कह रहे हैं
पी जाओ पी जाओ मेरो पहाड़ को ठण्डो पानी..........................
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ऎसे ही एक गीत में गोस्वामी जी ने ऊत्तराखण्ड प्रदेश की प्रमुख नदी काली (शारदा) के सौन्दर्य का बडा सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया है:
काली गंगा को कालो पानी ...............................................
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अब देखिये इस गीत में गोस्वामी जी प्रक्रति के सौन्दर्य से प्रभावित होकर अपने आप को मानव रूप की बजाय प्रक्रति के किस रूप में देख्नना चाह रहे हैं:
चल रूपा हिलांसै कि जोडी बनी जुंला ...................................
Chal Rupa Hilasein ki Jodi Bani Jun lau
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गोस्वामी जी पहाड़ और पर्यावरण प्रेमी तो थे ही जोकि उनके गीतों से स्पष्ट है पर साथ ही वह पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी जागरूक थे। जैसे नीचे के गीत में गोस्वामी जी बान्ज के जंगल को न काटने का सन्देश दे रहे हैं:-
सरकारी जंगल लछिमा बान्ज नी काट लछिमा बान्ज नी काटा.....
इसी प्रकार इस गीत में गोस्वामी जी की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरुकता प्रदर्शित होती है:-
आज यौ मेरी सुन लो पुकारा, धाद लगौं छ यौ गोपाला................
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इस प्रकार हम कह सकते हैं कि गोस्वामी जी पर्यावरण तथा उसमें हो रहे बद्लावों के प्रति समाज को सचेत करने का कार्य तभी शुरु कर चुके थे जब हमारी सरकार तथा समाज का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग सोया हुवा था। यहां पर मैंने गोस्वामी जी के पर्यावरण प्रेम से सम्बन्धित गीतो के बारे उल्लेख किया है, पर गोस्वामी जी का हर गीत कुछ न कुछ सन्देश अवश्य प्रदान करता है। आ़गे हम गोस्वामी जी के गीतों के माध्यम से पहाड़ी समाज के अन्य सरोकारों को भी जानने का प्रयास करेंगे।
एक महान कलाकार वही है जो अपनी कला के माध्यम से केवल समाज का मनोरन्जन ही ना करे बल्कि समाज के प्रति अपने अन्य दायित्वों को भी समझे तथा समाज को उसके प्रति अपनी कला के माध्यम से जागरूक करे। गोस्वामी जी ने जिस प्रकार एक बहुत ही साधारण जीवनशैली में जीवन निर्वाह करते हुये अपनी कला के माध्यम से पूरे समाज को मनोरन्जन के साथ साथ उनके सामाजिक उत्तर्दायित्वों का जो सन्देश दिया है वह उनको उत्तराखण्ड ही नही देश के महान कलाकरों की श्रेणी में रखता है।

गुरुवार, 12 जून 2008

स्व गोपाल बाबु गोस्वामी जी के सदाबहार सुमधुर गीत

मित्रों
कुमाऊँ में शायद ही कोई ऐसा होगा जो स्व गोपाल बाबु गोस्वामी जी के नाम से अपरिचित हो! गोस्वामी जी के सुमधुर गीतों को सुनकर कौन नही कुमाऊँ की सुरम्य वादियों में खो न जाता हो! लेकिन आजकल स्व गोस्वामीजी के गीतों को मूल रूप में प्राप्त करना बड़ा मुश्किल है इसी समस्या के चलते मैंने अपने एक परिचित के सहयोग से गोस्वामी जी के करीब ७५ पुरानो गीतों को एकत्र कर उन गीतों को mp3 format में बदल कर इंटरनेट पर अपलोड कर दिया जिससे गोस्वामी जी के गीतों के प्रशंसक कम से कम उन गीतों की झलक प्राप्त कर सकें तहत नए लोग भी उनकी आवाज से परिचित हो सकें पुराने होने के कारन ये गीत गोस्वामी जी की सुमधुर वाणी को साकार टू नही कर सकते हैं, नही आजकल के संगीत की तकनीकी से मुकाबला कर सकते हैं
मेरा उद्देश्य किसी के व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुँचने का भी नही है, मैं केवल उस महान गायक की आवाज को आप पाठकों तक पहुँचाना चाहता हूँ
कृपया नीचे के लिंक पर जाकर क्लीक करें:-
www.esnips.com/web/gopalbabugoswami
इस संग्रह में से गोस्वामी जी के कुछ प्रसिद्ध गीत मैं यहाँ नीचे भी आपके लिए दे रहा हूँ:-मुझे आशा है आप लोग जरुर गोस्वामी जी के गीतों का रसास्वादन करेंगे

Bati gye barat cheli bhait doli ma
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