सोमवार, 30 जून 2008

जागर - उत्तराखंड में देवताओं के आह्वान का पवित्र अनुष्ठान

सभी जानते हैं कि उत्तराखंड प्रदेश को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है, ऐसा माना जाता है कि इस अंचल के कण-कण में देवी देवता निवास करते हैं। उत्तराखण्ड देवाधिदेव महादेव भगवान् शिव का घर (कैलाश पर्वत) भी है और ससुराल (कनखल, हरिद्वार) भी हमारे वेद-पुराणों में भी सभी देवी-देवताओं का निवास हिमालय के उत्तराखण्ड अंचल में ही माना गया है। उत्तराखण्ड में शिव मन्दिर प्रायः हर स्थान पर पाए जाते है इसीलिए यहाँ के बारे में कहा जाता है कि, "जितने कंकर, उतने शंकर"। सभी हिंदू देवी देवताओं की आराधना के साथ साथ यहाँ पर स्थानीय रूप से पूजे जाने वाले कई देवी-देवताओं का भी यहाँ की संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है
जागर शुद्ध संस्कृत शब्द है जो जाग के साथ घल् प्रत्यय लगाकर बना है उसका अर्थ है जागरण उत्तराखंडवासियों का ऐसा विश्वास है कि देवी-देवता अपने भक्तों का हर कष्ट का निवारण करने के लिये हमारे पास आते हैं देवताओं की की आत्मा के किसी पवित्र शरीर के माध्यम से कुछ समय के लिए अवतरित होने की इसी प्रक्रिया को कहा जाता है- "जागर"। जागर शायद जागरण का ही अपभ्रंश हो सकता है क्योंकि जागर का आयोजन सामान्यतया रात्रि में ही होता है। लेकिन जिस रूप में इसका आयोजन किया जाता है उसके अनुसार जागर से अभिप्राय एक ऎसे रात्रि जागरण या जगराते के आयोजन से है जहां एक अदृश्य आत्मा (देवी-देवताओं) को जागृत कर उसका आह्वान कर उसे किसी व्यक्ति के शरीर में अवतरित किया जाता है।
इस प्रकार गूढ़ अर्थ में जागरण से अभिप्राय केवल जागने से ना होकर देवता की आत्मा को जागृत करने तथा उसे किसी व्यक्ति में (जिसे डंगरिया कहते हैं) में अवतरित कराने से है। इस कार्य के लिये जागरिया जागर लगाता है तथा देवता के आह्ववान हेतु देवता की जीवनी और उसके द्वारा किये कार्यों का बखान अपने साथी गाजे बाजे वालों के साथ गाते हुये करता है। जगर में वाद्य यंत्रों के रूप में हमारे लोक वाद्य हुड़्का और कांसे की थाली का प्रमुख रुप से प्रयोग किया जाता है। इन गीतों को जागर कहने का तर्क यह है कि इनमें देवी शक्ति को जाग्रत करने का आह्वान होता है, इसलिये इनका प्रारंभ जागने-जगाने के उद्बोधन से होता है
अवधि के अनुसार जागर कई प्रकार की होती है:-
सामान्य जागर एक दिन (रात्रि में) की होती है
विशेष प्रयोजन हेतु चार दिन तक आयोजित की जाने वाली जागर के इस कार्यक्रम को चौरास कहते हैं। बैसी- बाईस दिन लगातार आयोजित की जागर के कार्यक्रम को बैसी कहते हैं। यह किसी बड़े परिवारसमूह के द्वारा सामूहिक रूप से आयोजित की जाती है

स्थान के अनुसार जागर घर के अंदर तथा घर के बाहर या मंदिरों में बने विशेष स्थल पर आयोजित की जाती है
आयोजित किए जाने उद्देश्य के अनुसार जागर दो प्रकार की होती है:
एक जागर जो जिसका आयोजन देवी देवताओ या अपने ईष्ट की आराधना के लिए होता है
दूसरी जागर किसी मृत आत्मा (जैसे के किसी पूर्वज जिसकी अकाल मृत्यु हुयी हो और अंतिम संस्कार विधिपुर्वक न हुआ हो) की शान्ति के लिए!
जागर के संचालन में मुख्य रुप से निम्न लोग शामिल होते है:-
१- जगरिया या धौंसिया
२- डंगरिया
३- स्योंकार-स्योंने या सोंकार
४- गाजेबाजे वाले - जो जगरिया के साथ गायन में तथा वाद्ययंत्रों के संगीत से सहयोग करते हैं।
इनके अतिरिक्त स्योंकार के घर के अन्य सदस्य, सम्बन्धी, मित्रगण व गांव पड़ोस के लोग भी जागर में दर्शक की तरह शामिल होते हैं तथा देवता से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
जगरिया या धौंसिया-
जगरिया या धौंसिया उस व्यक्ति को कहा जाता है जो अदृश्य आत्मा को जागृत करता है, इसका कार्य देवता की जीवनी, उसके जीवन की प्रमुख घटनायें व उसके प्रमुख मानवीय गुणों को लोक वाद्य के साथ एक विशेष शैली में गाकर देवता को जागृत कर उसका अवतरण डंगरिया से शरीर में कराना होता है।यह देवता (जोकि डंगरिया के शरीर में अवतरित होते हैं) को प्रज्जलित धूनी के चारों ओर चलाता है और उससे जागर लगवाने वाले की मनोकामना पूर्ण करने का अनुरोध करता है। यह कार्य मुख्यतः हरिजन लोग करते हैं और यह समाज का सम्मानीय व्यक्ति होता है, इसके लिये जागर लगवाने वाला व्यक्ति नये वस्त्र और सफेद साफा लेकर आता है और यह उन्हें पहन कर यह कार्य करता है। जगरिया को भी खान-पान और छूत आदि का भी ध्यान रखना होता है।
डंगरिया, पश्वा या धामी-
डंगरिया वह व्यक्ति होता है, जिसके शरीर में देवता का अवतरण होता है, इसे डगर (रास्ता) बताने वाला माना जाता है, इसलिये इसे डंगरिया कहा जाता है। जब डंगरिया के शरीर में देवता का अवतरण हो जाता है है तो उसका पूरा शरीर कांपता है और वह सभी दुःखी लोगों की समस्याओं के समाधान बताता है, उसे उस समय देवता की तरह ही शक्ति संपन्न और सर्वफलदायी माना जाता है।
डंगरिया को गढ़वाल तथा कुछ अन्य स्थानों पर ’पस्वा’ या ’धामी’ भी कहा जाता है यह भी देखा गया है कि धामी बनने का यह रिवाज पीढी दर पीढी चलता है अर्थात धामी की उमर हो जाने पर वही देवता धामी के पुत्र पर या परिवार के किसी अन्य सदस्य पर अवतरित होने लगता है धामी या पस्वा लोगो को कई तरह के परहेज रखने होते हैं सामान्यत: धामी लोग हाथ में “कङा” पहनते हैं, देवता शरीर में अवतरण से पहले और देवता के शरीर को मुक्त कर देने के बाद धामी सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगते हैं।
डंगरिया या धामी को समाज में मह्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है और सभी उसका आदर और सम्मान करते हैं। इस व्यक्ति की दिनचर्या हमारी तरह सामान्य नहीं होती, उसे रोज स्नान ध्यान कर पूजा करनी होती है, वह सभी जगह खा-पी नहीं सकता। यहां तक कि चाय पीने के लिये भी विशेष ध्यान उसे रखना होता है। उसे हमेशा शुद्ध ही रहना होता है अन्यथा देवता कुपित हो जाते हैं और उस व्यक्ति को दण्ड देते हैं ऎसी मान्यता है। जागर के वक्त भी डंगरिया गो-मूत्र, गंगाजल और गाय के दूध का सेवन कर, शुद्ध होकर ही धूणी में जाते हैं।

स्योंकार-स्योंनाई-
जिस घर में या घर के लोगों द्वारा जागर आयोजित की जाती है, उस घर के मुखिया को स्योंकार या सोन्कार और उसकी पत्नी को स्योंनाई कहा जाता है। यह अपनी समस्या देवता को बताते हैं और देवता के सामने चावल के दाने (जिसे दाणी भी कहते) रखते हैं, देवता चावल के दानों को हाथ में लेकर उनकी समस्या के बारे में जान लेते हैं और उसकी समस्या का कारण तथा समाधान बताते हैं।

जागर के लिये धूणी:-
जागर के लिये धूणी बनाना भी आवश्यक है, इसे बनाने के लिये लोग नहा-धोकर, पंडित जी की अगुवाई में शुद्धतापुर्वक एक शुद्ध स्थान का चयन करते हैं तथा वहां पर गौ-दान किया जाता है। फिर वहां पर गोलाकार भाग में थोड़ी सी खुदाई करके गड्ढा सा बना दिया जाता है जिससे वहां पर राख को एकत्र किया जा सके और वहां पर जलाने के लिए लकड़ियां रखी जाती हैं। लकड़ियों के चारों ओर गाय के गोबर और दीमक वाली मिट्टी ( यदि उपलब्ध न हो तो शुद्ध स्थान की लाल मिट्टी) से उसे लीपा जाता है। फ़िर धूणी में जागर लगाने से पहले स्योंकार द्वारा दीप जलाया जाता है, फिर शंखनाद कर धुणी को प्रज्जवलित किया जाता है। इस धूणी में तथा जागर लगने वाले स्थान पर किसी भी अशुद्ध व्यक्ति के जाने और जूता-चप्पल लेकर जाने का निषेध होता है।
जागर के संचालन का मुख्य कार्य जगरिया करता है और वह अपने व सहयोगियों के गायन-वादन से जागर को निम्न आठ चरणों (भागों) में पूर्ण कराता है:-
१- प्रथम चरण - सांझवाली गायन (संध्या वंदन)
२- दूसरा चरण- बिरत्वाई गायन (देवता की बिरुदावली गायन)
३- तीसरा चरण- औसाण (देवता के नृत्य करते समय का गायन व वादन)
४- चौथा चरण- हरिद्वार में गुरु की आरती करना
५- पांचवा चरण- खाक रमण
६- छठा चरण- दाणी का विचार करवाना
७- सातवाँ चरण आशीर्वाद दिलाना, संकट हरण का उपाय बताना, विघ्न-बाधाओं को मिटाना
८- आठवां चरण- देवता को अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत और हिमालय को प्रस्थान कराना
१- प्रथम चरण - सांझवाली गायन (संध्या वंदन)
जागर के प्रथम चरण में जगरिया हुड़्के या ढोल-दमाऊं के वादन के साथ सांझवाली का वर्णन करता है, इस गायन में जगरिया सभी देवी-देवताओं का नाम, उनके निवास स्थानों का नाम और संध्या के समय सम्पूर्ण प्रकृति एवं दैवी कार्यों के स्वतः प्राकृतिक रुप से संचालन का वर्णन करता है। सांझवाली गायन बड़ा लम्बा होता है, जिसे जगरिया धीरे-धीरे गाते हुये पूर्ण करता है। जब जागर का प्रथम चरण, सांझवाली पूर्ण होता है, इसे जगरिया द्वारा हुड़्के या ढोल-दमाऊं पर गाया जाता है। जगरिया वैसे तो कम पढ़ा लिखा या नितान्त अनपढ़ ही होता है, लेकिन अगर हम उसके द्वार गाई जाने वाली सांझवाली का विवेचन करें तो पता चलता है कि वह अन्तर्मन से कितना समृद्ध है। उसकी सांझवली का विस्त्तार तीनों लोकों तक है, जिसमें प्रकृति, ईशवर और हमारे स्थानीय देवताओं के विभिन्न स्वरुपों का विराट रुप में वर्णन है।
२- द्वितीय चरण- बिरत्वाई
इस चरण में जिस देवता की जागर लगाई जाती है या जिस देवता का आह्वान किया जाता है, उस देवता की उत्पत्ति, जीवनी और उसके द्वारा किये गये उन महत्वपूर्ण कार्यों का विवरण जगरिया अपने गायन में करता है। जिसे बिर्त्वाई कह्ते हैं अगर हम बिर्त्वाई शब्द के मूल में जायें तो इसका अर्थ वीरता प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें देवता की वीरता का बखान इस प्रकार किया जाता है कि उसे सामान्य स्तर के व्यक्ति से ऊपर उठाकर देवता बना दिया। इस प्रकार देवता को आह्वानित किया जाता है और जब बिरत्वाई अपने अंत पर पहुंचती है तो डंगरिया के शरीर में कम्पन होने लगता है, इसका अर्थ है कि उसके शरीर में देवता का अवतरण हो शुरु हो गया है, अब जगरिया बिरुदावली को बंद कर औसाण देने लगता है।
३- तृतीय चरण- औसान
इस समय तक डंगरिया के शरीर में देवता की आत्मा का प्रवेश हो चुका होता है तथा देवता को नाचने हेतु प्रेरित करने के लिए जगरिया औसाण देता है। औसान देते समय हुड़्के या अन्य वाद्य यंत्रो की गति बढ़ जाती है, औसान के सन्गीत से मन्त्रमुग्ध होकर देवता अपने पूर्णरुप एवं शक्ति के साथ धूणी के चारों ओर नाचने लगता है। औसाण का हर शब्द देवता में जोश पैदा करता है, इस समय डंगरिया ऎसे ऎसे कार्य कर देता है, जो वह अपने एक साधारण मनुस्य के वास्तविक रूप में कभी भी नही कर सकता। इसी से यह महसूस होता है कि डंगरिया के शरीर में कोई दिव्या शक्ति या देवात्मा प्रवेश कर जाती है।
४- चौथा चरण- गुरु की आरती
इस चरण में देवता द्वारा गुरु की आरती की जाती है, ऎसा माना जाता है कि हमारे सभी लोकदेवता पवित्र आत्मायें हैं। गुरु गोरखनाथ इनके गुरु हैं और इन सभी देवताओं ने कभी न कभी हरिद्वार जाकर कनखल में गुरु गोरखनाथ जी से दीक्षा ली है। तभी इनको गुरुमुखी देवता कहा जाता है, इस प्रसंग का वर्णन जगरिया अपने गायन द्वारा देवता के समक्ष करता है। इस समय नृत्य करते समय देवता के हाथ में थाली दे दी जाती है और थाली में चावल के दाने, राख, फूल और जली हुई घी की बाती रख दी जाती है, देवता नृत्य करते हुये थाली पकड़्कर अपने गुरुजी की आरती करते हैं।
५- पांचवा चरण- खाक या भिभूति (भभूत) रमाना
जागर के इस चरण में खाक रमाई जाती है, अपने गुरु की आरती के उपरान्त देवता द्वारा धूणी से राख निकाली जाती है। उसके बाद थाली में रखी हुई राख को देवता सबसे पहले अपने माथे पर लगाते हैं, उसके बाद जगरिया को फिर वाद्य यंत्रों पर राख लगाते हैं। इसके बाद वहां पर बैठे लोग क्रम से देवता के पास जाते हैं और देवता उनके माथे पर राख (भिभूत) लगाकर उनको आशीर्वाद देते हैं।
६- छठा चरण- दाणि का विचार
सभी को भिभूति लगाने के बाद जागर के छठे चरण में देवता स्योंकार की दाणि का विचार करते हैं। दाणी का विचार से मतलब है, जिस घर में देवता का अवतरण किया गया है, उस घर की परेशानी का कारण क्या है? इसी बात पर देवता विचार करते हैं, वह हाथ में चावल के दाने(दाणी) लेकर विचार करते हैं और परेशानी का कारण और उसका समाधान भी बताते हैं।
७- सातवां चरण- आशीर्वाद देना
स्योंकार-स्योंनाई की दाणी के विचार के बाद जागर के सातवें चरण में देवता स्योंकार-स्योंनाई को आश्वस्त करते हैं कि उन्होने उनके सभी कष्टों को अभी से हर लिया है। उनकी जागर की सफ़ल हुयी है तथा प्रसन्न होकर देवता द्वारा उनके सुखी पारिवारिक जीवन के लिये आशीर्वाद दिया जाता है। वहां पर बैठे सभी लोगों के लिये भी देवता मंगलकामना करते हुये उनको अशीर्वाद देते हैं।
८- आठवां चरण- देवता का अपने निवास के लिये प्रस्थान करना
यह चरण जागर का अंतिम चरण होता है, क्योंकि जिस कार्य के लिये जागर लगाई गई थी वह कार्य पूरा हो जाता है। देवताओं को सूक्ष्मरुपधारी माना गया है और ऎसा माना जाता है कि सभी देवता हिमालय में निवास करते हैं। अतः जगरिया अब अंतिम औसाण (अवसान) देता है और देवता अंतिम बार नाचते हैं और नाचते हुये खुशी खुशी अपने धाम की ओर वापस चले जाते हैं। जगरिया से वह इस बात का वादा करते हैं कि जब भी स्योंकार-स्योंनाई पर संकट होगा, उसके निवारण हेतु वह जरुर आयेंगे।देवता के अपने निवास को प्रस्थान के बाद देवता की आत्मा डंगरिया के शरीर को मुक्त कर देती है। इसके बाद डंगरिया के शरीर में कम्पन बंद हो जाता है और उनका शरीर निढ़ाल सा हो जाता है। थोडी देर लेटे रहने के बाद उन्हें फिर से गंगाजल, गो-मूत्र दिया जाता है, उसके बाद वह सामान्य रुप में आ जाते हैं। यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि जागर के समाप्त होने के उपरांत वह व्यक्ति जिसके शरीर में देवता अवतरित होते हैं (डंगरिया), अपने सामान्य रूप में आ जाता है तथा एक सामान्य मनुष्य की तरह ही व्यवहार करता है।
जागर एक पवित्र अनुष्ठान है, जिसमे यह माना जाता है कि देवताओं की आत्मा मनुष्य के शरीर में कुछ अवधि के लिए आकर आयोजनकर्ता के परिवार को आशीर्वाद प्रदान करती है। इसके आयोजन में साफ सफाई, सुचिता और पतित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। किसी भी प्रकार की त्रुटि होने या सुचिता का ध्यान न रखे जाने पर देवता के कोप का भागी होना पड़ सकता है।
एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ साथ जागर एक समृद्ध संगीत विधा भी है, इसी कारण उत्तराखंड के सभी लोक गायकों द्वारा जागर का गायन भी किया गया है। जिनकी Music CD बाजार में उपलब्ध है और आप इनको खरीदकर जागर के संगीत का आनंद प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यह संगीत मनोरंजन के लिए न होकर भक्ति भावना के साथ गाया और सुना जाता है। सुनने वालों को भी इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि इससे लोगों के धार्मिक विश्वास कि ठेस नही पहुंचनी चाहिए। क्योंक जागर एक पवित्र अनुष्ठान है इसलिए इसके गायन में भी उसी प्रकार की पवित्रता और सुचिता रखी जानी चाहिए जैसे उसके आयोजन के समय घरों में रखी जाती है।
एक बार देहरादून के परेड ग्राउंड में प्रसिद्ध लोक गायक श्री प्रीतम भर्तवान जी देवी जागर प्रस्तुत कर रहे थे। जो दर्शक इसकी समझ नही रखते वह उसे कोई फिल्मी गीत समझकर फिल्मी तरीके से नाच रहे थे, जिसे देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। ऐसे में इसको प्रस्तुत करने वालों को कम से कम इतना तो बताना चाहिए कि देवी जागर और एक फिल्मी गीत में क्या अन्तर है? परन्तु व्यावसायिकता के इस दौर में म्यूजिक कंपनियां और हमारे लोकगायक भी शायद अपनी जिम्मेदारी को उतने गंभीर रूप से नही ले रहे हैं। उनका उद्देश्य संस्कृति का प्रचार न होकर केवल व्यावसायिक होकर रह गया है इस समृद्ध धार्मिक अनुष्ठान एवं संगीत का प्रचार प्रसार अधिक से अधिक होना चाहिए परन्तु इसके वास्तविक स्वरुप के बारे में भी लोगों को जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही जागर जैसे पवित्र अनुष्ठान का के गायन वादन सार्वजनिक रूप से किसी फ़िल्मी तमाशे की तरह तो नही होना चाहिये।
आधुनिक पीढी के पढ़े- लिखे लोग अब जागर जैसी परम्पराओं पर कम ही विश्वास करते हैं और इसको अंधविश्वास मानते हैं। लेकिन उत्तराखंड में जागर लगाते हुये जिस प्रकार देवता का आह्वान किया जाता है, इस प्रकार के अनुष्ठान विश्व भर में किसी न किसी समय प्रचलित रहे है। व्यक्ति को माध्यम बना कर दैवीय शक्ति के आह्वान के उदाहरण मिश्र, चीन, जापान, अफ्रीका, ब्राजील आदि कई देशों में भी मिलते हैं। वैसे भी अंधविश्वास और श्रद्धा में बहुत थोडा सा ही अन्तर होता है, जिसे उसको जानने वाला ही महसूस आकर सकता है।
इस लेख का संकलन जागर के बारे में श्री पंकज सिंह महर जी तथा श्री हेम पन्त जी द्वारा जुटायी गयी महत्वपूर्ण जानकारी के आधार पर किया गया है। अगर आप जागर के बारे में अधिक जानने की ईच्छा रखते हैं तो निम्न लिंक पर मेरा पहाड़ फ़ोरम में शामिल होकर जागर के बारे में और विस्तार से जान सकते हैं। अगर आप जागर के सम्बन्ध में और जानकारी रखते हैं तो अपने विचार भी अन्य सदस्यों के साथ बांट सकते हैं।
http://www.merapahad.com/forum/index.php?topic=376.0
पाठको के विचार सदर आमंत्रित हैं, सभी को भगवान जागर के आयोजन के समान आशीर्वाद प्रदान करें! धन्यवाद्

9 टिप्‍पणियां:

  1. Bekar lekh hai.sab andhviswas hai.Devi Devta kuch nahi hote.Devta ke nam par shaitan ki puja karete hai.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. Tum kisi shaitan se km ho
      Ye andhvishwash nhi h.
      Devi devta hote h or jagar ke roop me wo aate h lekin tum jaise andhvishwashi shaitan log ise kbhi nhi smjh skte.

      हटाएं
  2. आपके विचार का स्वागत है, जो लाखों लोगो का विश्वास है वह आपके लिए अंधविश्वास हो सकता है| इस विश्व में कुछ भी स्थाई या प्रमाणिक नही है| एक ईश्वर ही परम सत्य है, अब यह मनुष्य पर निर्भर है की वह उस ईश्वर को किस रूप में देखता है|

    उत्तर देंहटाएं
  3. परिवार में इसके बारे में सुना था , देखा कभी नहीं है । विस्तृत जानकारी देने के लिए धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

    उत्तर देंहटाएं
  4. jo log en sb ko galat kahate hai ...un ka bhi bhagwan bhala kare......joshi ji thanx ki aap ne uttarakhand ki parampara or biswas ko Aapane sabdhu mai likha hai....Aap bilkul sahi hai.....

    उत्तर देंहटाएं
  5. राजेश जोशी जी आपका लेख पड़ा तो अच्‍छा लगा अपनी कुमाऊ संस्‍कृति के बारे में में इस दौर से गुजर चुका हूँ लेकिन मेरे मन में हमेशा से यह प्रश्‍न रहा है क्‍या भगवान ऐसा होता है जो हम जागर में देखते है बोलिये ? और क्‍या मुझे आपे इस बारे में और ज्‍यादा जानकारी दे सकते है कि ये कहॉं और कब से कैसे शुरू हुआ मैं इस बारे और ज्‍यादा जानना चाहता हुँ कि वास्‍तव में यह है क्‍या ?

    उत्तर देंहटाएं
  6. राणा हरीश राणा2 अगस्त 2013 को 5:29 pm

    जागर एक ऐसी प्रथा है जिसमें आप जब चाहो कुछ कार्यक्रमों के संचालन के बाद ईश्वर को बुला लो :)
    मगर यही एक ऐसी प्रथा है जो इसमें घुस गया वो पीढ़ी दर पीढ़ी इससे बाहर नहीं निकल पाया ॥ कोई मुक्त हुआ हो तो बताइएगा ॥ कोई न कोई कमी हमेशा रह ही जाती है ,और पीढ़ियाँ उसका भुगतान करती रहती है ॥
    मैं स्वयं कुमाऊनी हूँ ,मगर मुझे भी यह सब एक आडंबर लगता है ,ठीक एक टोटके की तरह ॥ जागर की वजह से ही हमारा कुमाऊँ पीछे रह गया है ,यहाँ जुकाम भी हो जाये तो लोग जागर या विभूत लगवाने में यकीन रखते हैं ॥ बकरियों की हत्याएँ ,मुर्गा ,शराब आदि भला कौन सा देवता भोग स्वरूप चाहेगा ?

    उत्तर देंहटाएं
  7. Overall kahu to devi devta powerful hote hai. Ham mitti m mil jate h lekin hamare devi devta hame har problem se dur le jate h jo manta hai uske liye bhagwan h jis trah hamare personal realtion trust se jude hote h usi trah se jagar v trust pe jude hote h I am very happy that you guys r spreading importance of kumaoni jagar jo kahta h jagar se hamara Uttarakhand piche rah gaya h wo jara japan china ya western counties m jake dekehke waha pe v apni culture ko badawa diya jata hai dharam parivartan aaj india m khub ho raha h uske baare m koi bol nahi pata hai Christian missionaries ne hindu ko Christian bana diya h wo v to apne religion ko bada rahe h kher savi jante hai aaj islam Christian sab log apne ko powerfull mante ..aur ham log hai jo dev bhumi m rahte h Himalaya jesi jagh m fir v kahte h ki ye andhviswas h saram aati h yaaro sayad jo log apne aap ko khub modern samjhta h sayad w/o ye v jante honge ki 1 din uski v death hogi fir wo kaha jayega after death sayad iska answer kisi k paas nahi to fir devi devtao ki pooja karne se problems kyu h sayad bhagwan ko jaan nahi paya hoga kafi kuch kahna chahta hu 1 baat kah deta hu bhai logo bhagwan hame bahut pyar karte h hame unko v pyar karte rahna chahiye aur 1 guru ka hona v jaruri h Kyu ki guru bin gyan na upje guru bin mite na bhed ram bhagwan krishna bhagwan sabke guru the jo mahan hue kher jo v ho sabka mangal ho Bhawgan Nawling bajnen bhagwati nanda kalika mata sabki help kare apne sabdo ko yahi sameta hu kisi ka dil dukha ho to sorry jai dhari mata aapki jai ho jai kotgarhi mata jai nawling banjen devta jai golu devta jai mata mahakalika jai garjiya bhagwati mata jai manila mata jai nanda devi mata jai kasar devi mata jai renuka mata prasanna jai pinglinaag devta jai basuki naag devta jai berinag devta jai kalinaag devta jai mul narayan devta jai bharadi devi mata jai ho nauling banjen devta aapki jai ho ..a

    उत्तर देंहटाएं
  8. Jagar Guru parmpara like Gita gyan...pl be continue ...but peacefully...

    उत्तर देंहटाएं