गुरुवार, 17 जुलाई 2008

"भिटौली": ऊत्तराखण्ड की एक महत्वपूर्ण सामाजिक परम्परा

"भिटौली" शब्द भेंट से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ स्थानीय भाषा में मिलने से होता है, जहां तक इस त्योहार का समबन्ध है तो इसमें शादीशुदा लड़्की के मायके वाले अपनी बहन/बेटी को उसके ससुराल में जाकर भेंट (यहां पर यह स्थानीय भाषा के अनुसार मिलने और उपहार देने दोनो अर्थों में है) या "भिटौली" देते हैं। इस भेंट में मायके वालों की तरफ़ से पहले पिता (अगर जीवित हैं तो) इसे लेकर लड़की के घर जाते हैं तथा पिता की मृत्यु के बाद भाई इस कार्य को निभाते हैं। यह प्रथा इसलिये भी शुरु हुई होगी कि पहले आवागमन के सुगम साधन उपलब्ध नहीं थे और ना ही लड़की को मायके जाने की छूट। लड़की किसी निकट समबन्धी के शादी ब्याह या दु:ख बिमारी में ही अपने ससुराल से मायके जा पाती थी। इस प्रकार अपनी शादीशुदा लड़की से कम से कम साल में एक बार मिलने और उसको भेंट देने के प्रयोजन से ही यह त्यौहार बनाया गया होगा। भाई-बहन के प्यार को समर्पित यह त्यौहार (रिवाज) सिर्फ उत्तराखण्ड के लोगों के द्वारा मनाया जाता है। विवाहित बहनों को चैत का महिना आते ही अपने मायके से आने वाली 'भिटौली' की सौगात का इंतजार रहने लगता है।

शादी के बाद की पहली भिटौली लड़की को उसकी डोली (विदाई) के समय समय ही दी जाती है, और उसके बाद जो पहला चैत का महीना होता है (लड़की की शादी के वर्ष) उसे काला महीना कहा जाता है, लड़की उस महीने (शादी के एक साल के अंदर पढ़ने वाले चैत के महीने में) अपने मायके में ही रहती है। जिस कारण शादी के पहले वर्ष की भिटौली वैशाख में लड़की को ससुराल में विदा करते समय दी जाती है (क्योंकि विवाह के पहले वर्ष के चैत्र को काला महीना माना जाता है), फिर अगले वर्ष से जन्म पर्यंत भाई अपनी बहिन को हर वर्ष चैत्र के महीने में भिटौली देता है। चैत्र महीने की ५ गते तक विवाहित महिला को स्वयं तथा किसी और के द्वारा उसके सामने महीने का नाम लेना भी वर्जित होता है।

उत्तराखण्ड की हर विवाहित महिला चैत माह में अपने मायके वालों से भिटौली का इंतजार करती है, जिसे पूरे गांव में बांटा जाता है। यह त्यौहार हमारे सामाजिक सदभाव का भी प्रतीक है। इस माह का महिलाओं के लिये कितना महत्व है, हमारे लोकगीतों के माध्यम से सहज ही जाना जा सकता है। स्व० गोपाल बाबू गोस्वामी जी का यह गीत इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता है:
"ना बासा घुघुती चैत की, याद आ जैछे मैके मैत की...................."

भिटौली से संबंधित कई कहानियां प्रचलित है, जिसमें से एक प्रकार है कि:
बहुत समय पहले किसी गांव में सचदेव नाम का लड़का रह्ता था, उसकी बहिन का विवाह पाताल लोक में किसी नाग के साथ हुआ था। जब उसकी बहन का विवाह हुआ तब सचदेव बहुत छोटा था। जैसे जैसे सहदेव बड़ा हुआ और जब शादी के कई साल बीतने पर भी उसकी बहिन मायके नही आ पायी तो सचदेव को अपनी बहन की याद सताने लगी। और एक दिन वह उससे मिलने पाताल लोक चला गया, लेकिन नाग ने सहदेव को पहले कभी देखा नही था। उन दोनों भाई बहनों को साथ देखकर वह उन दोनो के रिश्ते को शक की निगाह से देखने लगा। क्योंकि नाग सचदेव से कभी मिला नही था, इसलिये उसने उन भाई बहनो के बारे में कुछ अपमानजनक बातें कही। ऐसी लज्जाजनक बातें सुन कर सचदेव को बड़ ग्लानि हुयी और उसने आत्महत्या कर ली। नाग को जब असलियत का पता चला तो उसने भी आत्महत्या कर ली। अपने भाई व पति के देहान्त के उप्रान्त सचदेव की बहिन ने सोचा कि अब उसकी भी जिंदगी व्यर्थ है और उसने भी अपनी इहलीला समाप्त कर दी। इन दोनों भाई-बहनो के त्याग और बलिदान को याद करते हुए त्यौहार आज भी प्रचलन में है.

भिटौली के सम्बन्ध में एक और दंत कथा (लोक कथा) इस प्रकार की भी प्रचलित है:
एक गाँव में नरिया और देबुली नाम के भाई - बहन रहते थे और दोनो भाई बहनों में बहुत प्यार था। जब देबुली १५ वर्ष की हुयी तो उसकी शादी हो गई (जो उस समय के अनुसार शादी के लिए बहुत ज्यादा उम्र थी)। देबुली की शादी के बाद भी दोनों भाई बहनों को ही एक दूसरे का विछोह सालता रहा। दोनों भाई बहन भिटौली के त्यार की प्रतीक्षा करने लगे। अंततः समय आने पर भिटौली के दिन नरिया भिटौली की टोकरी सर पर रख कर खुशी - खुशी बहन से मिलने चला। बहन देबुली बहुत दूर ब्याही गयी थी, पैदल चलते - चलते नरिया शुक्रवार की रात को दीदी के गाँव पहुँच पाया। जब नरिया अपनी बहन देबुली के घर पहुंचा तो देबुली तब गहरी नींद में सोई थी, थका हुआ नरिया भी देबुली के पैर के पास सो गया। सुबह होने के पहले ही नरिया की नींद टूट गयी, देबुली तब भी सोई थी और नींद में कोई सपना देख कर मुस्कुरा रही थी। अचानक नरिया को ध्यान आया कि सुबह शनिवार हो जायेगा और शनिवार को देबुली के घर ले कर आने के लिये उसकी ईजा ने मना कर रखा था। नरिया ने भिटौली की टोकरी दीदी के पैर के पास रख दी और उसे प्रणाम कर के वापस अपने गाँव चला गया। देबुली सपने में अपने भाई को भिटौली ले कर अपने घर आया हुआ देख रही थी, नींद खुलते ही पैर के पास भिटौली की टोकरी देख कर उसकी बांछें खिल गयीं। वह भाई से मिलने दौड़ती हुई बाहर गयी, लेकिन भाई नहीं मिला। वह पूरी बात समझ गयी, |भाई से न मिल पाने के हादसे ने उसके प्राण ले लिये। कहते हैं देबुली मर कर 'घुघुती' (उत्तराखण्ड में घुघुती चिड़िया को सभी जानते हैं) बन गयी और चैत के महीने में आज भी कुछ इस प्रकार गाती है:
भै भुखो मैं सिती, भै भुखो मैं सिती

भिटौली आने पर घर में त्यौहार का माहौल हो जाता है, क्योंकि हर घर में बहुऎं अपने मायके से आने वाली "भिटौली" का ईन्तजार करती हैं। घर में भिटौली के साथ आने वाले पकवानों को गांव-पडोस में बांटा जाता है और इस तरह यह त्यौहार सामाजिक सदभाव को भी बढ़ावा देता है। चैत्र मास के दौरान पहाडो में सामान्यतः खेतीबारी के कामों से भी लोगों को फुरसत रहती है। जिस कारण यह रिवाज अपने नाते-रिश्तेदारो से मिलने जुलने का और उनके हाल-चाल जानने का एक माध्यम बन जाता है।

आज से कुछ दशक पहले जब यातायात व संचार के माध्यम इतने नहीं थे उस समय की महिलाओं के लिये यह परंपरा बहुत महत्वपूर्ण थी। जब साल में एक बार मायके से उनके लिये पारंपरिक पकवानों की पोटली के साथ ही उपहार के तौर पर कपडे आदि आते थे। इसमें एक तथ्य और है कि जब तक किसी महिला को भिटौली नहीं मिलती तब तक उस महिला के सामने चैत महीने का नाम नहीं लिया जाता है तथा इसे अपशगुन माना जाता है। ऎसा होने पर वह महिला अपने पहने कपड़े फाड़ देती है, ताकि उसका भाई जीवित रहे। पर यह सब परम्पराऎं अब केवल प्रतीकात्मक रूप में ही मौजूद रह गयी हैं।

समय बीतने के साथ-साथ इस परंपरा में कुछ बदलाव आ चुका है। इस रिवाज पर भी औपचारिकता और शहरीकरण ने गहरा प्रभाव छोडा है, वर्तमान समय में अधिकतर लोग फ़ोन पर बात करके कोरियर से गिफ़्ट या मनीआर्डर/ड्राफ़्ट से अपनी बहनों को रुपये भेज कर औपचारिकता पूरी कर देते हैं। आज यह त्योहार भाई बहन के प्रेमभाव की बजाय आर्थिक हित साधने का तथा स्टेटस सिमबल ज्यादा बनता जा रहा है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी प्रेमभाव व पारिवारिक सौहार्द के साथ भिटौली का खास महत्व बना हुआ है।

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