शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

वसन्त पंचमी उल्लास और उमंग का त्यौहार

प्राचीन काल में विद्वानों ने भारत में पूरे वर्ष को छह मौसमों में विभक्त किया था जिसमें वसंत का मौसम लोगों का सबसे मनचाहा मौसम है। यह वह मौसम है जब फूलों पर बहार आ जाती, सरसों के खेत सुनहरे रंग से चमकने लगते समय जौ और गेहूँ की बालियाँ निकलनी शुरु हो जाती हैं और आमों के पेड़ों पर बौर आने लगता है। रंग बिरंगे फ़ूल हर तरफ़ खिलने लगते हैं जिन पर हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। इस वसन्त ऋतु के स्वागत के लिए माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन एक बड़ा उत्सव मनाया जाता था जिसमें सरस्वती,विष्णु और कामदेव की पूजा होती है और जो वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है तथा पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।

वसन्त पंचमी का त्यौहार कुमाऊं अंचल में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है, यह दिन ऋतुराज वसन्त के स्वागत के रूप में मनाया जाता है। इस दिन वसन्ती (पीला) रंग का विशेष महत्व होता है तथा लोग वसन्ती रंग के वस्त्र धारण करते हैं। नही तो कम से कम वसन्त पंचमी के प्रतीक के रूप में वसन्ती रंग से रंगे हुये रूमाल को अपने पास रखते हैं। इस दिन पक्वान भी पीले रंग के बनाकर रिश्तेदार और मित्रगणों में बांटे जाते हैं। घर में जौ के पौधों के साथ देवताओं और मां सरस्वती की पूजा अर्चना की जाती है।

यह एक पवित्र व उत्तम दिन माना जाता है, इस दिन का प्रत्येक प्रहर शुभ माना जाता है जिस कारण इस दिन शुभ कार्यों को किसी मुहुर्त विशेष का ईन्त्जार न कर आयोजित किया जाता है। विद्या की देवी सरस्वती का दिन होने के कार्ण शिशुओं के विद्या आरम्भ, मुण्डन तथा अन्न्प्राशन जैसे संस्कारों हेतु यह एक उपयुक्त दिन माना जाता है। जिस कारण शिशुओं के संस्कार इस पवित्र तिथि को सम्पन्न किये जाने का विशेष महत्व हैं।

कुमाऊं अन्चल में इस दिन का एक और महत्व इस कारण से भी है कि वसन्त पंचमी के दिन से ही कुमाऊंनी बैठकी होली का आरंभ भी इस दिन से हो जाता है। कुमाऊनी होली की परंपरा के अनुसार वसन्त पंचमी से फ़ाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी तक बैठकी होली का गायन चलता है। इस प्रकार बैठकी होली के गायन के प्रारम्भ के साथ ही होली के उत्सव की शुरुवात हो जाती है।

इसके साथ ही कुमाऊं के सबसे बड़े त्यौहार घुघूतिया का समापन भी वसन्त पंचमी को हो जाता है क्योंकि विशेष पकवान घुघूत बनाने का यह अन्तिम दिन होता है। घुगूतिया त्यार की परंपरा के अनुसार घुघूते नाते रिश्तेदारों और मित्रों में बांटने हेतु घुघूतिया के दिन प्रारम्भ कर, वसन्त पंचमी के दिन तक बनाये जा सकते हैं। अगर किसी परिवार में घुघूतिया के दिन बनाये घुघूते रिश्तेदारों में बाटने के लिए कम पड़ जाते हैं तो वसन्त पंचमी के दिन यह पकवान कभी भी बनाया जा सकता है।

इस प्रकार कुमाऊं में वसन्त पंचमी का दिन दो महत्वपूर्ण त्यौहारों के सेतु के रूप में अपना एक विशेष स्थान रखता है परन्तु इस दिन का महत्व पौराणिक काल से ही पूरे देश में चला आ रहा है। अगर हम पौराणिक काल में इस त्यौहार के महत्व क देखें तो हमारे प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने विभिन्न जीवों के साथ-साथ मनुष्य योनि की रचना की। इसकी बावजूद वह अपनी इस रचना से वे संतुष्ट नहीं थे, उन्हें लगता था कि स्रुष्टि में कुछ कमी रह गई है जिस कारण चारों आ॓र मौन छाया रहता है। अंत में विष्णु भगवान से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से प्रूथ्वी पर जल छिड़का, जिस कारण जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा तथा वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ।

प्रकृति का यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी देवी के रूप में था जिसके एक हाथ में वीणा थी तथा दूसरा हाथ वर देने की मुद्रा में था। देवी के अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी, ब्रह्मा ने देवी को हाथ जोड़्कर प्रणाम किया तथा उनसे वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा के तारों को झंकृत किया, मधुरनाद से संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। विश्व की समस्त जलधाराओं में स्वरों का संचार होते ही उसमें कोलाहल व्याप्त हो गया तथा पवन के चलने से सरसराहट की ध्वनि होने लगी। देवी के इस रूप तथा गुणों से प्रभावित होकर सृष्टि के रचियता ब्रह्मा ने देवी को वाणी की देवी सरस्वती के नाम से सम्बोधित किया। देवी सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। सरस्वती देवी विद्या और बुद्धि प्रदाता मानी जाती हैं, देवी के द्वारा संगीत की उत्पत्ति करने के कारण देवी सरस्वती संगीत की देवी भी हैं।
बसन्त पंचमी को देवी सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।

ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है कि,
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार देवी भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है।
पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है। पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा।

इसके साथ ही यह पर्व हमें अतीत की अनेक प्रेरक घटनाओं की भी याद दिलाता है। सर्वप्रथम तो यह हमें त्रेता युग से जोड़ती है। रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दंडकारण्य भी था। यहीं शबरी नामक भीलनी रहती थी। जब राम उसकी कुटिया में पधारे, तो वह सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। प्रेम में पगे झूठे बेरों वाली इस घटना को रामकथा के सभी गायकों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया। दंडकारण्य का वह क्षेत्र इन दिनों गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला है। गुजरात के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था। वसंत पंचमी के दिन ही रामचंद्र जी वहां आये थे। उस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में उनकी श्रध्दा है कि श्रीराम आकर यहीं बैठे थे। वहां शबरी माता का मंदिर भी है।

वसंत पंचमी का दिन हमें इतिहास पुरुष पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं।
इस सम्बन्ध में प्रुथ्वीराज रासो में वर्णित घटना एतिहासिक रूप से प्रमाणित ना होते हुये भी जगप्रसिध्द है, जिसके अनुसार गोरी ने प्रुथ्वीराज चौहान को मृत्युदंड देने से पूर्व उनके शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा। पृथ्वीराज के साथी कवि चंदबरदाई के परामर्श पर मुहम्मद गोरी ने ऊंचे स्थान पर बैठकर तवे पर चोट मारकर संकेत किया,तभी चंदबरदाई ने पृथ्वीराज को कविता के माध्यम से संदेश दिया कि:
चार बांस चौबीस गज,अंगुल अष्ट प्रमाणता ऊपर सुल्तान, मत चूको चौहान॥ पृथ्वीराज चौहान ने इस बार भूल नहीं की। उन्होंने तवे पर हुई चोट और चंद्रबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह गौरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भोंककर आत्मबलिदान दे दिया। कहा जाता है कि प्रुथ्वीराज चौहान के बलिदान की यह ऎतिहासिक घटना वर्ष 1192 ई को वसंत पंचमी के दिन ही हुई थी।

वसंत पंचमी का लाहौर निवासी वीर हकीकत राय से भी गहरा संबंध है। कहा जाता है कि एक दिन जब मुल्ला जी किसी काम से विद्यालय छोड़कर चले गये, तो सब बच्चे खेलने लगे पर वह पढ़ता रहा। जब अन्य बच्चों ने उसे छेड़ा, तो बच्चे ने अपने साथियों को दुर्गा मां की सौगंध दी, जिस पर मुस्लिम बालकों ने दुर्गा मां की हंसी उड़ाई। हकीकत ने उनको समझाने के लिए कहा कि यदि में तुम्हारी बीबी फातिमा के बारे में कुछ कहूं,तो तुम्हें कैसा लगेगा? बस फिर क्या था, मुल्ला जी के आते ही उन शरारती ने छात्रों हकीकत राय की शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है। जिससे बात बढ़ते हुए काजी साहब तक जा पहुंची, मुस्लिम शासन में हिन्दु हकीकत राय के विरुद्ध वही निर्णय हुआ जिसकी कि अपेक्षा थी। हकीकत राय को आदेश हुआ कि या तो वह मुसलमान बन जाये, अन्यथा उसे मृत्युदंड दिया जायेगा। हकीकत राय ने मुसलमान बनना स्वीकार नहीं किया, परिणामत: उसे तलवार के घाट उतारने का फरमान जारी हो गया। कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गयी तब वीर हकीकत ने तलवार उसके हाथ में दी और कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? इस पर जल्लाद ने दिल मजबूत कर तलवार चला दी, पर उस वीर का शीश धरती पर नहीं गिरा। वह आकाशमार्ग से सीधा स्वर्ग चला गया। वीर बालक हकीकत राय ले बलिदान की यह ऎतिहासिक घटना भी वसंत पंचमी को (२३-०२-१७३४) हुई थी। पाकिस्तान यद्यपि मुस्लिम देश है,परन्तु वीर हकीकत राय के आकाशगामी शीश की याद में ाज भी वहां वसंत पंचमी पर पतंगें उड़ाई जाती है। हकीकत राय लाहौर के निवासी थे जिस कारण पतंगबाजी का सर्वाधिक जोर लाहौर में रहता है।

वसंत पंचमी हमें गुरू रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है जिनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे रणजीत सिंह की सेना में रहे, फिर घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, पर आध्यात्मिक रुझान होने के कारण वह आस पास के लोगों को प्रवचन देने जिससे प्रभावित होकर दूर दूर से इनके प्रवचन सुनने लोग आने लगे। धीरे-धीरे प्रवचन सुनने वाले इनके शिष्यों ने अपना एक अलग पंथ ही बना लिया, जो कूका पंथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गुरू रामसिंह गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उध्दार, अंतरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिष्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी। उन दिनों प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था, 1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को मुसलमानों ने घेर लिया फ़िर उन्होंने उसे पीटा और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये तथा उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया पर दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी,अत: युध्द का पासा पलट गया। इस संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हुए और 68 पकड़ लिये गये। इनमें से 50 को सत्रह जनवरी 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ाकर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गयी। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।

वसंत ऋतु आते ही हमारे देश में प्रकृति का कण-कण खिल उठता है,मानव तो क्या पेड़-पौधे तथा पशु-पक्षी भी उल्लास से भर जाते हैं। वसन्त पंचमी के दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।

आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति के अनुशरण की अन्धी दौड़ में आज हम अपनी पुरानी परंपराओं को छोड़ते जा रहे हैं, एसे में वसन्त पंचमी के बारे में आज की युवापीढ़ी को ज्यादा जानकारी नही है। शीत ऋतु के बाद छाई उदासी और सुस्ती के का बाद प्रकृति व मनुस्य में नयी ऊर्जा का संचार करने वाले वसन्त का स्वागत करने वाले वसंत पंचमी जैसे पर्व का एक विशेष महत्व है जिसे नयी पीढ़ी को समझाने की जरुरत है। मै समझता हुं कि हमारी पुरानी परंपराओं को युवाओं द्वारा ना अपनाये जाने के लिए पुरानी पीढ़ी का स्वयं केवल पैसा कमाने तथा नयी पीढ़ी को शिक्षा में अंको के प्रतिशत की अंधी दौड़ में लगा देने का दृष्तिकोण, अंग्रेजों द्वारा हमें गुलाम बनाये रखने की सोच वाली शिक्षा पद्धति और मीडिया सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। जिस कारण वसन्त पंचमी की बजाय उसका पाश्चात्य संस्करण वैयेण्टाईन डे(जिसे प्रसिद्ध व्यंगकार श्री ओम व्यास जी ने "प्रेमचौदश" का नाम दिया है) युवाओं में इतना लोकप्रिय है।

शनिवार, 10 जनवरी 2009

कूमाऊं का प्रसिद्ध "घूघुतिया त्यार" यानि मकर संक्रान्ति

मकर संक्रान्ति का त्यौहार वैसे तो पूरे भारत वर्ष में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है और यही त्यौहार हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नाम और तरीके से मनाया जाता है। इस त्यौहार को हमारे उत्तराखण्ड में "उत्तरायणी" के नाम से मनाया जाता है तथा गढ़वाल में इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश की तरह "खिचड़ी संक्रान्ति" के नाम से मनाया जाता है। कुमाऊं में यह त्यौहार स्थानीय भाषा में घुघुतिया के नाम से जाना जाता है यह कूमाऊं सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है और मैं समझता हूं कि यह एक स्थानीय पर्व होने के साथ साथ हमारा स्थानीय लोक उत्सव भी है। क्योंकि इस दिन एक विशेष प्रकार क व्यंजन घुघुत बनाया जाता है जिस कारण कूमाऊं में मकर संक्रान्ति को ऊत्तरायणी के साथ साथ घुघुतिया त्यार के नाम से ज्यादा जाना जाता है।

घुघुते बनाने की भी अपनी अलग तरह की परंपरा है, यह एक ऐसा व्यंजन है जो केवल इस अवसर पर ही बनाया जाता है। वैसे बनाने में यह कोई विशिष्ट रैसीपी नही है। सबसे पहले पानी गरम करके उसमें गुड़ डालकर चाश्नी बना ली जाती है, फ़िर आटा छानकर इसे आटे में मिलाकर गूंथ लिया जाता है। जब आटा रोटी बनाने की तरह तैयार हो जाता है तो आटे की करीब ६" लम्बी और कनिष्का की मोटाई की बेलनाकार आकृतियों को हिन्दी के ४ की तरह मोड़्कर नीचे से बंद कर दिया जाता है। इन ४ की तरह दिखने वाली आकृतियों को स्थानीय भाषा में घुघुते कहते हैं। घुघुतों के साथ साथ इसी आटे से अन्य तरह की आकृतियां भी बनायी जाती हैं, जैसे अनार का फ़ूल, डमरू, सुपारी, टोकरी, तलवार आदि पर सामुहिक रूप से इनको घुघूत के नाम से ही जाना जाता है। घुघुते बनाने का क्रम दोपहर के बाद करीब २:०० - ३:०० बजे से शुरु हो जाता है जिसमें परिवार का हर सदस्य योगदान करता है।

आटे की आकृतियां बन जाने के बाद इनको सुखाने के लिए फ़ैलाकर रख दिया जाता है। रात तक जब घुघुते सूख कर थोड़ा ठोस हो जाते है तो उनको घी या वनस्पति तेल में में पूरियों की तरह तला जाता है। वैसे इस समय तक बच्चे सो जाते है पर अगर बच्चों की उत्सुक्ता अधिक हुयी तो किसी को भी तलते समय बात करने के मनाही रह्ती है। हमें तो बचपन में यह कह कर शान्त रह्ने को कहा जाता था कि अगर शोर करोगे तो घुघुते उड़ जायेंगे। इसका मुख्य कारण यह है कि इससे रसोइये का ध्यान भंग ना हो, दुसरा कारण यह भी रहता है कि थूक के छीटे अगर गर्म तेल में पड़ेंगे तो तेल के छींटे भी काफ़ी नुकसान कर सकते हैं। पर एक विशेष बात यह रहती है कि घुघुते कौओं को खिलाने से पहले कोई नही खा सकता।
घुघुतों को तलने के बाद इनकी माला बनायी जाती है जिसे और सुन्दर बनाने के माला में मूंगफ़ली, स्थानीय फ़ल जैसे मालटा/नारंगी, बादाम की गरी या अन्य मेवे भी पिरोये जाते हैं। घुघुतों की माला बनाने के बाद इनको अगले दिन कौओं खिलाने की तैयारी के साथ संभालकर रख दिया जाता है।

कूमाऊं के अल्मोड़ा, चम्पावत, नैनीताल तथा उधमसिंहनगर जनपदीय क्षेत्रों में मकर संक्रान्ति को (अर्थात माघ मास के १ गते को) घुघुते बनाये जाते हैं और अगली सुबह (२ गते माघ को) को कौवे को दिये जाते हैं (कौओं को पितरों का प्रतीक मानकर यह पितरों को अर्पण माना जाता है)। वहीं रामगंगा पार के पिथौरागढ़ और बागेश्वर अंचल में मकर संक्रान्ति की पूर्व संध्या (पौष मास के अंतिम दिन अर्थात मशान्ति) को ही घुघुते बनाये जाते हैं और मकर संक्रान्ति अर्थात माघ १ गते को कौवे को खिलाये जाते हैं।
वैसे तो पहाड़ो में कौए को प्रिय माना जाता है और तड़के उसका स्वर घर के आस पास सुनायी देना शुभ माना जाता है पर इस दिन कौओं की विशेष पूछ रहती है। छोटे-छोटे बच्चे भी तड़के उठ, स्नान करके तैयार हो जाते हैं और घुघुतों की माला पहन कर कौवे को आवाज लगाते हैं;
काले कौवा का-का, ये घुघुती खा जा
काले कौव्वा का-का, पूस की रोटी माघे खा
इसी प्रकार के कई नारे हैं जैसे
काले कौआ काले, घुघुति माला खा ले आदि
इसके बाद शुरू होता है रिश्तेदारों तथा मित्रगणों के घर-घर घुघूते बांटने का सिलसिला और यह कई दिनों तक चलता रहता है। जो सद्स्य घर से दूर रहते हैं उनके लिए घुघूते सम्भाल कर रख दिये जाते हैं, जिससे जब वह घर पर आयें तो उनको खाने के लिए दिये जा सकें। जो लोग अपने घर से दूर रहते हैं उनको भी घुघूते खाने का ईन्तजार रहता है। आजकल घुघूते प्रियजनों तक पार्सल और कोरियर के माध्यम से भी भेजे जाने लगे हैं। वैसे घुघूतिया के दिन घुघूते बनाने के बाद इनको आवश्यकतानुसार बसन्त पंचमी तक बनाया जा सकता है, पर इस दिन इनको हर घर में बनाया जाना आवश्यक होता है।

घुघुतिया त्यार से सम्बधित एक कथा प्रचलित है....
कहा जाता है कि कूमाऊं में एक राजा था जिसके मंत्री का नाम घुघुतिया था। घुघुतिया एक कुशल योद्धा होने के साथ साथ बड़ा ही महत्वाकांक्षी भी था। धीरे धीरे उसकी महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गयी कि वह खुद राजा बनने की सोचने लगा। एक बार जब वह अपने किसी साथी के साथ राजा को मारकर ख़ुद राजा बनने का षड्यन्त्र बना रहा था तो एक कौए ने उनकी बातें सुन ली। कौआ बड़ा ही चतुर पक्षी समझा जाता है, जिस कारण ही बाल कथाओं में प्यासे कौए की कहानी बड़ी प्रसिद्ध है।

कौव्वे को जैसे ही राजा की हत्या की साजिश की जानकारी हुयी, उसने तुरन्त आकर राजा को इस बारे में सूचित कर दिया। राजा को पहले तो विश्वास नही हुआ परन्तु उसने घुगुतिया को गिरफ़तार कर कारागार में डाल दिया। जिसके बाद जांच में बात सही पाये जाने पर राजा द्वारा मंत्री घुघुतिया को मृत्युदंड मिला। कौए की इस चतुराई और राजा के प्रति राजभक्ति से राजा बड़ा प्रभावित हुआ और उसने राज्य भर में घोषणा करवा दी कि मकर संक्रान्ति के दिन सभी राज्यवासी कौव्वो को पकवान बना कर खिलाएंगे। तभी से कौओं के प्रति सौहार्द प्रकट करने वाले इस अनोखे त्यौहार को मनाने की प्रथा की शुरूवात मानी जाती है।

विश्व में पशु पक्षियों से सम्बंधित कई त्योहार मनाये जाते हैं पर कौओं को विशेष व्यंजन खिलाने का यह अनोखा त्यौहार उत्तराखण्ड के कुमाऊं अंचल के अलावा शायद कहीं नही मनाया जाता है। वैसे कौए की चतुराई के बारे में कहावत है कि मनुष्यों में नौआ और जानवरों में कौआ अर्थात मानवों में नाई और जानवरों में कौआ सबसे बुद्धिमान होते हैं। कौए की चतुराई के बारे में कई वैज्ञानिक शोध भी हो चुके जिनसे भी इस बात की पुष्टि हुयी है कि कौए का मष्तिष्क अन्य पशु-पक्षियों से अधिक विकसित होता है।
काले कवा काले, घुघुती मावा खा ले - घुघुती त्यौहार मुबारक !