शुक्रवार, 14 मई 2010

कुमाऊनी महिलाओं की पहचान - रंगवाली पिछौड़ा

भारतीय महिलाओं के पारंपरिक परिधानों में लहंगा-दुपट्टा (घाघरा-ओढ़नी) विशेष महत्व रखता है, देश के अन्य अंचलों की तरह ही उत्तराखण्ड के विभिन्न अंचलों में यह परंपरागत रूप से महिलाओं द्वारा पहना जाता है। कुमाऊं अंचल में यहां की स्थानीय भाषा में घागरी-पिछोड़ा कहते हैं, घागरी से तात्पर्य लहंगे या घाघरे से तथा पिछौड़ा अर्थात दुपट्टा या ओढनी। यहां घागरी (लहंगा/घाघरा) किसी भारी फ़ैबरिक जैसे सनील (वेलवेट) की प्लेन या कढाई किया हुआ और दुपट्टा हल्के फ़ैबरिक और एक विशेष डिजाईन के प्रिण्ट का होता है।

ओढनी/दुपट्टे (पिछौड़ी या पिछौड़ा) के पारंपरिक डिजाईन (प्रिण्ट) को स्थानीय भाषा में रंग्वाली कहा जाता है शायद यह रंगोली शब्द का अपभ्रंश हो सकता है क्योंकि ये डिजाईन कुमाऊं में प्रचलित रंगोली जिसे ऎपण कहते हैं का ही प्रिण्ट संस्करण कह सकते हैं। शादी, नामकरण, व्रत त्यौहार, पूजन-अर्चन जैसे मांगलिक अवसरों पर परिवार व निकट रिश्तेदारों की महिला सदस्यों द्वारा यह परिधान विशेष रूप से पहना जाता है। इसे लहंगे के साथ पहने जाने का प्रचलन रहा है पर आजकल महिलाओं द्वारा सुविधानुसार साड़ी के साथ से भी पहना जाता है।

रंगवाली के डिजाईन में मध्य जैसे ऎपण की चौकी बनायी जाती है उसी से मिलते जुलते डिजाईय में स्वास्तिक का चिन्ह ॐ के साथ बनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में इन प्रतीकों का अपना विशेष महत्व है। जहां ॐ समस्त विश्व के सुक्ष्म स्वरूप और स्वास्तिक का चिन्ह अपनी खुली चार भुजाओं द्वारा सदैव चलायमान रहने का संदेश देता है। स्वास्तिक चिन्ह की चार मुड़ी हुयी भुजाओं के मध्य शंख, सुर्य, लक्ष्मी तथा घंटी की आकृतियां बनायी जाती हैं। सुर्य को हमारी संस्कृति में असीम ऊर्जा और शक्ति तथा निरंतरता का प्रतीक माना जाता है। वैज्ञानिक रूप से भी सुर्य हमारे लिए असीम ऊर्जा और इस पृथ्वी गृह पर जीवन का आधार है। दूसरी भुजा के अंदर देवी लक्ष्मी परिवार में धन धान्य व कुल तथा निकट सम्बन्धियों की उन्नति के प्रतीक के रूप में विराजमान रहती हैं। इसी प्रकार हिन्दु संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य का उदघोष शंख बजाकर किया जाना शुभ माना जाता है। ऎसा माना जाता है कि शंख की ध्वनि के समक्ष बुरी आत्माऎं और दोष निकट नही आ पाते। इसी प्रकार घंटी की ध्वनि भी शुभ कार्यों के समय इसी प्रयोजन से बजायी जाती है।

पहले रंगवाली पिछौड़ा घर पर ही मलमल, कौटन वाईल, चिकन फ़ैब या किसी अन्य हल्के सूती फ़ैब्रिक पर रंगकर बनाया जाता था। सबसे पहले सफ़ेद सूती कपड़े को धोकर सुखाया जाता था तथा फ़िर उसे पीले रंग से डाई किया जाता था। रगने के लिए मुख्य रूप से दो रंग पीला और लाल प्रयोग होते हैं जो बाजार में पंसारी की दुकान पर आसानी से उपलब्ध होते हैं। वैसे पुराने समय में पीला रंग हल्दी से या किलमोडे (किन्गोड़ा या किल्मोड़ी भी कहते हैं) की जड़ को कूटकर उसके रस से बनाया जाता था। इसी प्रकार लाल रंग के लिए हल्दी को कूटकर उसमें नीबू और सुहागा मिलाकर तांबे के बर्तन में रख देते थे और दुसरे दिन उसे पकाकर लाल रंग तैयार हो जाता था। उसके उपरान्त सूखने पर सिक्के के बाहर कपड़ा लपेटकर बांध लिया जाता था, जो इस पीले कपड़े पर प्रिण्ट करने के काम में लिया जाता था। क्योंकि प्रिण्टिंग का सारा कार्य महिलाओं द्वारा सिकके की सहाय्ता से हाथों से होता था तो प्रिण्ट करने वालों का सिद्धहस्त होना अति आवश्यक था।

सबसे पहले सिक्के खड़ी अवस्था में प्रयोग कर उसके किनारों से रंग लगाकर मध्य की महीन आकृतियां जैसे स्वास्तिक तथा उसके अंदर की फ़ूल पत्तियां और उसकी चारों भुजाओं की आकृतियां बनायी जाती हैं। यह कार्य प्रवीण महिलाओं द्वारा ही किया जाता है क्योंकि इन आकृतियों को बनाना सभी के लिए आसान नही है। मध्य की चौकी वाली प्रिण्टिंग हो जाने के बाद इसके चारों ओर सिक्के को पड़ी अवस्था में प्रयोग कर गोल बूटे छापे जाते हैं य कार्य इतना मुशकिल नही होता केवल पैटर्न का ध्यान रख्ना होता है तो इस कार्य के लिए कम प्रवीण या नौसिखियों और बच्चों को भी लगाया जाता है। अंत में पिछौड़े का बार्डर बनाया जाता है जो फ़िर सिक्के को खड़े रूप में प्रयोग कर रेखाओं द्वारा बनाया जाता है।

पिछोड़े के मुख्य प्रारूप में मध्य की चौकी मे स्वास्तिक और अन्य चिन्ह बनाये जाते हैं। तदोपरान्त बाहर के भाग पर सिक्कों से बने गोल बूटे तथा उसके बाद पिछोड़े का बार्डर मुख्य हैं। अन्य बातें कलाकर की योग्यता तथ उसकी परिकल्पना पर निर्भर करती हैं जैसे चारों कोनों पर कुछ अन्य शुभ प्रतीक या फ़ूल पत्तियां आदि। मध्य चौकी में भी स्वास्तिक व अन्य प्रतीकों को विभिन्न आकृतियां बनाकर सजाया जा सकता है। यह सब रगने वाली कलाकार पर निर्भर करता है कि वह इस प्रारूप को अपनी परिकल्पना और सिद्ध हाथों से कितना सुन्दर और आकर्षक बना सकत्ती है। पिछौड़े के बौर्डर पर चारों ओर प्लेन/फ़ैंसी लेस या गोटा सिलकर उसे और आकर्षक बनाया जा सकता है।

आजकल रेडीमेड और डिजाईनर पिछौड़ों का चलन हो गया है जो ज्यादा आकर्षक तथा आरामदायक हो सकते हैं। अब बाजार में जाइये अपनी पसन्द का पिछौड़ा खरीद लाईये, कुमाऊ के मुख्य बाजारों सभी जगह आपको रेडीमेड रंगवाली पिछौड़ा मिल जायेगा। इसके अलावा भी उत्तराखण्ड के मुख्य बाजारों तथा दिल्ली में भी कुछ विशेष दुकानों पर आपको यह उपलब्ध हो जायेगा। चाहे आज इस रेडीमेड पिछौड़े से वह पारंपरिक हाथ के रंगे पिछौड़े जैसी अपने लोककला की सुगंध ना आती हो पर एक बात तो तय है कि रंगवाली पिछौड़ा कई बदलावों के बावजूद आज भी कुमाऊनी लोक कला तथा कुमाऊं के पारंपरिक परिधान के रूप में अपनी पहचान बनाये हुए है। आज किसी महानगर या कुमाऊं के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान पर विवाह/उत्सव के मौकों पर रंगवाली पिछौड़ा ही कुमाऊनी महिलाओं को पहचान प्रदान करता है।

रंगवाली पिछौड़ा के सम्बन्ध में अग्रेजी में इस लेख को भी पढ़ें और चित्रों के माध्यम से अधिक जानकारी प्राप्त करें Culture of Tradition of Uttarakhand : Rangwali Pichhora (R&D, Courtesy- B C Joshi)

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

गोपाल बाबू गोस्वामी के गीतों में उत्तराखण्ड की क्षेत्रीय एकता का संदेश

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हर कलाकार अपनी कला के माध्यम से जनता का मनोरंजन तो करता ही है पर उसके साथ ही वह समाज को कुछ ना कुछ संदेश अवश्य देता है। कुमाऊनी के प्रसिद्ध लोकगायाक गोपाल बाबू गोस्वामी जी एक महान गायक व गीतकार होने के साथ-साथ उत्तराखण्ड के कुमाऊं एवं गढ़वाल अंचलों की एकता के प्रतीक भी हैं। अपनी रचनाओं उन्होने इस पहाड़ी प्रदेश के दोनों अंचलों को अपने गीतों में बराबर मह्त्व दिया है। इस मामले में वह अपने समकालीन या आजकल के गायक/गीतकारों से अलग नजर आते है जो एक क्षेत्र विशेष तक सिमट कर ही रहे हैं। अब आप उनके इस गीत को ही देख लिजिए:
हिमाला को उंचा डांना, प्यारो मेरो गांव,
हिमाला को उंचा डांना, प्यारो मेरो गांव,
छबीलो गढ़देश मेरो, रंगीलो कुमाऊं ।
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यो भुमि जनम मेरा, माधोसिंह मलेखा
यो भुमि जनम मेरा, माधोसिंह मलेखा,
गबर, चन्दर सिंह, आजादी का पैदा.
मिटायो जुलम तैको, दिखायो उज्यावो - २
छबीलो गढ़देश मेरो, रंगीलो कुमाऊं॥
छबीलो गढ़देश मेरो, रंगीलो कुमाऊं॥
Himala ko Uncha Dana
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अपने उक्त गीत में गोस्वामी जी ने दोनो ही अंचलों को बराबर महत्व दिया है। तथा आजकल उनके इस गीत की पंक्ति "छबीलो गढ़देश मेरो, रंगीलो कुमाऊं", उत्तराखण्ड राज्य की पहचान के रूप प्रयोग की जाती है।

इसी तरह गोस्वामी जी के इस देवी भजन की पंक्तियां देखिये, उन्होने किस प्रकार उत्तराखण्ड की प्रत्येक शक्तिपीठों को अपने भजन की पंक्तियों में पिरोया है:
दुर्गा भवानी, सुफल फलीए माँ, तेरी खुटी परणामा, छाई करिए माँ । -२

हे...... दूनागिरि शेरावायी, कायीगाड़ै की काली, दूनागिरि शेरावायी, कायीगाड़ै की काली।
थिरचौरै अगनेरी की देवी, करी दिये छाई, देघाटै की माता रांणी, मानिलै भवानी ।
गर्जिये उपटा देवी, माता शेरावायी॥
चन्द्रबदनी सुफल है जये, मैया.., छाई करिए माँ
कालीमठै की काली, तू लाज धरिये मां।
कालीमठै की काली, तू लाज धरिये मां।
दुर्गा भवानी, सुफल फलीए माँ, तेरी खुटी परणामा, छाई करिए माँ ।-२

हो ..... मनसा देवी हरिद्वारै की, मनसा देवी हरिद्वार की, देवी धुरै की बाराही।
तेरी खुटी हाथ जोड़नु, धरि दिये पत्ती।
गंगोली की महाकाली, गुरना की.. भवानी।
रक्षा कर दिए माता, हे शेरावायी।
हे दुर्गा भवानी, तू छाई करिए माँ, तेरी खुटि परणामा, तू छाई करिए माँ। -२
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गोस्वामी जी का यह प्रसिद्ध माता भजन देखियेगा .......
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जै मय्या दुर्गा भवानी, जै मय्याऽऽऽऽऽ..............

तेरी सिंहै की माता सवारी-२,
हाथ चक्र सुदर्शन धारी,
डाणा-काना में है रौछ वास -२,
पुर्णागिरी में जली रे जोतऽऽऽऽऽ
जै मय्याऽऽऽऽऽऽऽ...........................................

तेरी जैकार माता उपटा -२
तेरी जै-जै हो देवी का धुरा,
तेरी जैकार माता उपटा,
तेरी जै-जै हो देवी का धुरा,
तेरी जैकार माता गंगोली,
तेरी जैकार कायगाड़ काली
जै मय्याऽऽऽऽऽ ............................

दूनागिरी की सिंहवाहिनी-२,
तेरी जैकार चन्द्रबदनी,
दूनागिरी की सिंहवाहिनी,
तेरी जैकार चन्द्रबदनी,
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तेरी जैकार हे माता नन्दा,
तेरी जैकार देवी मानिला,
तेरी जैकार हे माता नन्दा,
तेरी जैकार देवी मानिला,
जै मय्याऽऽऽऽऽ..............................
Jai Mayya Durga Bhawani
Jai Mayya Durga Bh...
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ऎसे ही गोस्वामी जी ने कुछ गढ़वाली गीत भी गाये हैं।
Rami Baurani
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गढ़वाली की प्रसिद्ध लोकगाथा "रामी बौराणी" को अपने ओजपूर्ण स्वर में गाकर उन्होने इस गाथा को जैसे अमर ही कर दिया है।

pahad ki meeti -2 boli
pahad ki meeti -2 ...
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इस प्रकार हम देखते हैं कि गोपाल बाबू गोस्वामी जी एक सुरीली आवाज के धनी गायक (हाई पिच में अपने गीतो से वो सारे श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे), अच्छे गीतकार, संगीतकार होने के साथ-साथ पहाड़ की एकता के लिए भी हमेशा प्रयत्नशील रहे थे। उन्होने अपने गीतों में कुमाऊं तथा गढ़वाल अंचल को बराबर महत्व दिया है।

शनिवार, 13 मार्च 2010

कुमाऊं अंचल का हैप्पी न्यू इयर - फूलदेयी

उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊं अंचल में हर माह की शुरूवात किसी त्यौहार से ही होती है, पर नये वर्ष का आगमन अपना विशेष महत्व रखता है। नये वर्ष का उत्सव तो शुक्ल पक्ष की प्रथमी(संवत्सर पड़ाव) से प्रारंभ होता है पर चैत्र मास की संक्रान्ति को अर्थात विक्रम संवत के हैप्पी न्यु इयर (विक्रम संवत के पहले दिन) के दिन जो त्यौहार मनाया जाता है जिसे फूलदेयी या फ़ूलधेयी के नाम से जाना जाता है। कुमाऊं अंचल प्रकृति के संसाधनो से परिपूर्ण होने के कारण यहां के हर त्यौहार का प्रकृति से सम्बन्ध होना आश्चर्यजनक नही है या यह भी कहा जा सकता है कि शायद प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हुये ही इस अंचल के लोग सभी उत्सवों को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं।
फूलदेयी का शाब्दिक अर्थ है दरवाजे पर या देहरी पर जिसे कुमाऊं में धेयी या देयी कहते हैं फ़ूल डालने से है और इस प्रकार इस त्यौहार के नाम में ही इसको मनाने का सारा विवरण समाया हुआ है। शायद नये वर्ष के आगमन पर उसके स्वागत में तथा परिवार के सदस्यों को शुभकामनाऎं देने के लिए ही घर के दरवाजे पर फूल डालने की परंपरा शुरु हुयी होगी। जैसे आजकल पाश्चात्य प्रभाव में हम किसी मेहमान को पुष्प्गुच्छ (बुके) देकर सम्मानित करते हैं उसी प्रकार इस दिन नये वर्ष के स्वागत में बच्चे अपने घरों में तथा गांव के लोगों को नये वर्ष की बधाई देते हुये उनके घरों की देहरी पर पुष्प अर्पित करते हैं। इस दिन नये वर्ष के स्वागत में घर की देहरी को लीप कर या साफ़ करके उस पर सुन्दर ऎपण (रंगोली की तरह की कुमाऊं की एक लोककला) देकर उसे सजाया जाता है। अब हर घर की देहरी फूलदेयी के फूलों का ईन्तजार कर रही होती है।
हम सब जानते हैं कि हर त्यौहार पर बच्चों में विशेष उत्साह रह्ता है पर फूलदेयी तो एक तरह से बच्चों का ही उत्सव है जिस कारण इस दिन उनका उत्साह और अधिक हो जाता है। इस दिन कुंवारी लड़कियां और छोटे लड़के भी सुबह-सुबह जल्दी उठकर स्नान करके फूल एकत्र करते हैं और भगवान की पूजा कर सबसे पहले अपने घर की देहरी पर फूल डालते हैं। फ़िर एक थाली या गावों में निंगाल (बांस/रिंगाल) की टोकरी को फ़ूलों से भरकर, टोली बनाकर निकल पड़ते है गांव/मुहल्ले के घर-घरों में देहरी पर फूल डालने। जिस घर की देहरी पर फूल डाले जाते हैं उस परिवार को शुभकामनाऎं देते हुये वे कुछ इस प्रकार गाते भी जाते हैं:
फूल देई, छम्मा देई,
दैणी द्वार, भर भकार,
यौ देली सौ बार,
बारम्बार, नमस्कार,
फूले द्वार बारम्बार……
फूल देई-छ्म्मा देई।
जिस घर की देहरी पर बच्चे फूल डालते हैं उस परिवार के लोग बच्चों को चावल, गुड़ (कस्बों में आजकल टाफ़ियां/चाकलेट आदि भी दी जाती हैं) या पैसे आदि उपहार या धन्यवाद स्वरूप देते हैं। बच्चों द्वारा इकट्ठा किये गये चावल से शाम को घर में सेई नाम का व्यंजन बनाये जाने की भी परंपरा है। सेई चावल के आटे के हलवे की तरह का ही एक व्यंजन होता है जिसको निम्न प्रकार से बनाया जाता है:
पहले चावल को ३-४ घण्टे पानी में भिगोके रखा जाता है फ़िर चावलों को पानी से निकालकर उनको सिलबट्टे पर पीसा जाता है। अब पिसे हुये चावलो को कढा़ई में घी या तेल डालकर भुना जाता है और फ़िर मीठे के लिए उसमें चीनी या गुड़ डाला जाता हैं और लो तैयार है गर्मा गर्म सेयी आपके खाने के लिए एकदम तैयार! सेई को घर के सदस्यों और आस पड़ोस में भी बांटा जाता है।
चैत मास में बसन्त की धूम रहती है और चारों तरफ़ फूल ही फूल खिले रहते हैं, जंगल में जहां फ़्यूली, प्योली और बुरांस की रंगत नजर आती है तो घरों पर आड़ू, प्लम, खुमानी, नाशपाती के पेड़ भी फूलों से रंगे नजर आते हैं किसी का रंग गुलाबी, किसी का लाल तो किसी पेड़ पर सफ़ेद फूलों की छटा बिखरी रह्ती है। वैसे तो कुमाऊं में हर त्यौहार पर धेयी या देहरी पर ऎपण बनाये जाते हैं पर फूलदेयी के दिन इस पर छोटे छोटे बच्चे आकर फ़ूल डालते हैं तो उस दिन घर की देहरी की शोभा और भी बढ़ जाती है। यह त्यौहार होली के आस पास कुछ दिन बाद ही पड़ता है पर अब गायन का अंदाज बिल्कुल अलग हो जाता है होली के फाग की खुमारी अब धीरे-धीरे उतर रही होती है और नये साल के स्वागत में वे अब ऋतुरैंण और चैती गाने लगते हैं। पहाड़ी वाद्यों जैसे ढोल-दमाऊ बजाने वाले (जिनको स्थानीय भाषा में ढोली, बाजगी, बादी या औली आदि नामों से सम्बोधित किया जाता) इस दिन गांव के हर घर के आंगन में जाकर इन गीतों को गाते हैं। उपहार स्वरूप परिवार द्वारा उनको आटा, चावल, अन्य अनाज और दक्षिणा प्राप्त कर अपने घरों को आते हैं।
आज के दौर में त्यौहारों का स्वरूप धीरे या तो परिवर्तित हो रहा है या फ़िर वह केवल औपचारिकता मात्र रह गये हैं, फूलदेयी में भी काफ़ी परिवर्तन आये हैं। आज के बच्चों में अब वह पहले वाला उत्साह नही रह गया है क्योंकि यही समय उनकी वार्षिक परीक्षाओं का भी होता है। आजकल की पढ़ाई ने बच्चों को ज्ञान प्रदान करने की बजाय अंक प्रतिशत और रैंक की अंधी दौड़ में धकेल दिया है। फ़िर भी किसी भी रूप में सही फूलदेयी का त्यौहार कुमाऊं अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी उत्साहपूर्वक मनाया जाता है और "फूल देई, छम्मा देई" गाते सजे धजे बच्चों की टोलियां कही न कही दिखायी ही पड़ जाती हैं।
फूलदेयी जैसे त्यौहार एक ओर जहां हमारी वर्षों से चली आ रही परंपरा को आज भी जिन्दा रखे हुये हैं वही हमारे बच्चों को प्रकृति के और निकट लाने में भी सहायक हैं। इस तरह उनको अपने चारों ओर के पर्यावरण को और अधिक जानने का भी अवसर प्रदान होता है और उनके व्यवहारिक ज्ञान में भी बढ़ोतरी होती है। हमारी आशा है कि जब १ जनवरी को नये वर्ष के स्वागत में हम सैकड़ों बार हैप्पी न्यु ईयर का जाप करते है तो क्यों न भारतीय नववर्ष के मौके पर हमारे बच्चे "फूल देई, छम्मा देई" का उदघोष करते सुनायी दें और कुमाऊनी संस्कृति की इस विरासत को जिन्दा रखें।